आत्मसमर्पण के बाद पूर्व स्वास्थ्य निदेशक डॉ. अजय कुमार गुप्ता को जिला अदालत ने सशर्त नियमित जमानत दे दी है। शुक्रवार को सत्र न्यायाधीश (वन) शिमला की अदालत ने गुप्ता की जमानत याचिका को स्वीकार कर लिया।डॉ. अजय कुमार गुप्ता पर कोरोना काल के दौरान आवश्यक उपकरणों की खरीद-फरोख्त में हेराफेरी के आरोप हैं। अग्रिम जमानत के लिए उसे हिमाचल हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से कोई राहत नहीं मिली थी। हिमाचल हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत खारिज करते हुए कहा था कि आपातकाल जैसी स्थिति में भी आम जनता के जीवन से खिलवाड़ करने के संगीन जुर्म के आरोपी को जमानत पर रिहा करना उचित नहीं है।
अदालत ने अपने निर्णय में कहा था कि कोरोना जैसी महामारी के दौरान स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारी को जीवन रक्षक मशीनों के लेनदेन करते समय सजग रहना चाहिए था। लोगों की जान बचाने के लिए उचित कदम उठाने के बजाय वह अपने हित को सफल बनाने में लगा रहा। हाईकोर्ट के इस निर्णय को डॉ. अजय कुमार गुप्ता ने एसएलपी के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट के समक्ष चुनौती दी थी। शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के निर्णय पर मुहर लगाते हुए स्पष्ट किया कि यदि आरोपी आत्मसमर्पण करता है और नियमित जमानत के लिए आवेदन करता है तो उसकी याचिका का निपटारा नियमानुसार जल्द किया जाए। सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बाद डॉ. अजय कुमार गुप्ता ने गत दो फरवरी को आत्मसमर्पण कर दिया था।
मामले के अनुसार राज्य सतर्कता विभाग ने गुप्ता को कोरोना काल के दौरान आवश्यक उपकरणों की खरीद-फरोख्त घोटाले में नामजद किया है। अभियोजन पक्ष ने आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज किया है कि उसने कोरोना योद्धाओं के लिए मास्क, दस्ताने, थर्मल स्कैनर और पीपीई किट जैसे उपकरणों की खरीद-फरोख्त में हेराफेरी की है। राज्य सतर्कता विभाग ने स्वास्थ्य विभाग के पूर्व निदेशक डॉ. अजय कुमार गुप्ता और बलराम के बीच आपसी बातचीत के ऑडियो की जांच की थी। जांच में पाया गया कि आरोपी ने जीवन रक्षक मशीनें खरीदने के लिए 30 लाख रुपये की राशि स्वीकृत की थी। इस राशि में उसने 85 हजार रुपये प्रति मशीन कमीशन तय की थी। राज्य सतर्कता विभाग ने आरोपी के खिलाफ रिश्वत लेने संबंधी पुख्ता सबूत जमा किए और आरोपी के खिलाफ 17 सितंबर 2022 को प्राथमिकी दर्ज की।