धूल, मिट्टी, धुआं, प्रदूषण होने पर मुंह और नाक को कपड़े से ढकें। सिगरेट के धुएं से भी बचें। ताजा पेंट, कीटनाशक, स्प्रे, अगरबत्ती, मच्छर भगाने की कॉइल का धुआं, खुशबूदार इत्र आदि से यथासंभव बचाव करें। अधिक सर्दी से बचे रहें, ठंड में न घूमें। ठंड के दौरान गर्म वस्त्र पहनें, जिसमें सीने को ढककर रखें। पानी उबालकर पीएं, रात के समय सोने से पहले स्टीम ले। जितना अधिक हो सके, उतना पानी पीएं। हरी सब्जियों का अधिक सेवन करें।
छोटी से छोटी बीमारी होने पर भी डाक्टर से जांच करवाने के बाद ही दवाइयां खाएं। धूल वाले क्षेत्र में कम जाएं, धुएं से बचें। सुबह और शाम की सैर करने जाते हैं तो ठंड के समय इसका त्याग कर दें। यदि टहलने का मन करे तो दोपहर के समय धूप में टहले। शौच आदि के बाद हाथों को अच्छे से धोएं सहित कुछ भी कार्य करने के बाद अपने हाथों अच्छे से बार-बार धोएं। अधिक भीड वाले स्थान में जाने से बचे।
क्षेत्रीय अस्पताल सोलन के मेडिसन विशेषज्ञ डॉ. कमल अटवाल ने बताया कि बार-बार होने वाली खांसी, सांस लेते समय सीटी की आवाज, छाती में जकड़न, दम फूलना, खांसी के साथ कफ न निकल पाना, बेचैनी होना अस्थमा के लक्षण है। उन्होंने बताया कि अस्थमा से बचने के लिए संतुलित पौष्टिक आहार लेना चाहिए। इसके अलावा सफाई का खास ध्यान रखना चाहिए।
आयुर्वेद अस्पताल सोलन के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. अरविंद गुप्ता का कहना है कि अस्थमा कफजन्य रोग है। जो कफ के बढ़ने से पैदा होता है। आयुर्वेद में इस रोग को तमकश्वास के नाम से जाना जाता है। आयुर्वेद विधि से इस रोग का दो तरह से उपचार किया जाता है। जिसमें पंचकर्म विधि व औषद्यीय चिकित्सा शामिल है। डॉ. अरविंद गुप्ता के अनुसार इस बीमारी में मरीज को जल्द ठीक होने के लिए परहेज जरूरी हैं। आयुर्वेद विधि से 99.9 प्रतिशत मरीजों में अस्थमा की बीमारी पूरी तरह से ठीक हो सकती है।