अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा में निरमंड खंड से आए इन देवी-देवताओं में देवता चंभू रंदल, देवता चंभू कशोली, देवता चंभू उरटू और माता भुवनेश्वरी भाई-बहन हैं। हालांकि ये चार भाई और सात बहनें हैं, लेकिन दशहरा के लिए अठारह करड़ू की सौह में केवल चार भाई-बहन ही शिरकत करते हैं। अन्य एक भाई और छह बहनें दशहरा में नहीं आतीं।
इनके अलावा दशहरा की शोभा बढ़ाने निरमंड खंड से देवता शरशाही नाग, देवता सप्त ऋषि, देवता मार्कंडेय ऋषि नोर और देवता कुई कंडा नाग भी आए हैं। ये सभी देवी-देवता लालचंद प्रार्थी कलाकेंद्र के समीप स्थापित अस्थायी शिविरों में लंका दहन की परंपरा का निर्वहन होने तक श्रद्धालुओं को दर्शन देंगे।
शरशाई के देवता शरशाही नाग, घाटू के देवता कुई कंडा नाग और थंतल के देवता सप्त ऋषि को कुल्लू पहुंचने में तीन, कशोली के देवता चंभू को चार, रंदल के देवता चंभू और उरटू के देवता चंभू को पांच तथा दुराह की माता भुवनेश्वरी को छह दिन का समय लगा है।
देवता चंभू के कारदार राम दास, माता भुवनेश्वरी के कारदार केशव राम व देवता कशोली चंभू के कारदार लीला चंद ने कहा कि देवी-देवताओं के कारकूनों और हारियानों की मानें तो दशहरा में देवी-देवता सैकड़ों सालों से आ रहे हैं और देवालयों से निकलने से लेकर वापस पहुंचने तक कम से कम 15 दिन का समय लग जाता है।