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दिल्ली चुनाव में हार का भाजपा पर दोहरा असर

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दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिली करारी हार का असर हिमाचल प्रदेश की राजनीति पर भी पड़ रहा है। राज्य में अभी तक जो गुट खुद को उपेक्षित महसूस कर रहा था, उसे इस हार से एक नई ऊर्जा मिली है।
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इस गुट के नेताओं को चुनाव प्रचार तक के लिए नहीं बुलाया था। पहली बार ऐसा हुआ। प्रदेश के कई दिग्गज नेताओं को दिल्ली में चुनाव प्रचार के लिए नहीं बुलाया गया। कुछ नेता अपने जानने वाले के प्रचार करने के लिए खुद ही पहुंच गए।

मगर आधिकारिक तौर पर किसी को नहीं बुलाया गया था। सूत्रों का कहना है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह के पास पकड़ रखने वाले प्रदेश से जुड़े दूसरे गुट के नेताओं के इशारे पर ऐसा किया गया था।
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मजबूती खो रही है भाजपा

दिल्ली चुनाव के दौरान यह चर्चा शुरू हो गई थी कि प्रदेश की राजनीति पर पकड़ रखने वाला ग्रुप अब पूरी तरह हाशिए पर चला जाएगा, लेकिन इस हार ने उपेक्षित ग्रुप के लिए संजीवनी का काम किया है।

इस ग्रुप के नेताओं का कहना है कि भविष्य में इस ग्रुप और जमीन से जुड़े नेताओं की अनदेखी करना केंद्रीय नेतृत्व को महंगा पड़ सकता है। केंद्रीय नेतृत्व पर पकड़ रखने वाला ग्रुप प्रदेश भाजपा में अपनी पकड़ को मजबूत करने की जद्दोजहद में जुटा हुआ है, जिससे आगामी विधानसभा चुनाव तक पार्टी में पकड़ को और बढ़ाया जा सके।

वहीं, भाजपाध्यक्ष सतपाल सती का कहा है कि किसी भी चुनाव में किस राज्य के नेता को चुनाव प्रचार करना है या नहीं, यह केंद्रीय नेतृत्व तय करता है। दिल्ली चुनाव के आखिरी दिनों में कुछ नेताओं को बुलाया गया था। उन्होंने दिल्ली जाकर चुनाव प्रचार किया था।
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कांग्रेस नेताओं को बुलाया था चुनाव प्रचार के लिए

कांग्रेस नेतृत्व ने प्रदेश के मुख्यमंत्री, मंत्रियों सहित प्रदेश के तमाम नेताओं को चुनाव प्रचार करने के लिए बुलाया था। इन सभी ने दिल्‍ली में विभिन्‍न जगहों पर जनसभाएं की थी और जनता से वोट मांगें थे।

यह अलग बात है कि इस चुनाव प्रचार के बावजूद कांग्रेस की दिल्ली चुनाव में बेहद खराब प्रदर्शन रहा और कांग्रेस एक सीट भी नहीं जीत पाई। लेकिन प्रदेश के नेताओं को इसका कोई मलाल नहीं है। इसका कारण यह है कि उन्हें पहले से पता था कि दिल्ली में कांग्रेस की स्थिति अच्छी नहीं है।
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