हिमाचल प्रदेश का हर नागरिक हजारों के कर्ज तले दबा हुआ है। जन्म लेने वाले से लेकर बुजुर्ग व्यक्ति तक के सिर पर ऋण है। यह बोझ घटने के बजाय साल दर साल बढ़ता जा रहा है। इस कर्ज पर अंकुश लगा पाने में भाजपा और कांग्रेस दोनों सरकारें पूरी तरह नाकाम रही हैं।
कड़वी सच्चाई यह है कि प्रदेश के प्रत्येक व्यक्ति पर 48 हजार रुपये का लोन चढ़ा हुआ है। पड़ोसी राज्य पंजाब, उत्तराखंड और जम्मू कश्मीर के मुकाबले यह दर अधिक है। प्रदेश सरकार के लिए इन दिनों वित्तीय प्रबंधन बेहद मुश्किल हो रहा है।
कर्ज लेने के अलावा सरकार के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है। व्यय के मुकाबले आय न होने के कारण हिमाचल प्रदेश को या तो केंद्र या फिर कर्ज के भरोसे रहना पड़ रहा है। प्रदेश में आय के साधन भी सीमित हैं।