पाकिस्तान के राष्ट्रपिता मोहम्मद अली जिन्ना कट्टर मुसलमान नहीं थे। उन्होंने न नमाज पढ़ी और न ही रोजे रखे, लेकिन उन्हें इस बात का इल्म था कि अगर अलग मुस्लिम देश नहीं बना तो गृहयुद्ध जैसे हालात हो जाएंगे। पाकिस्तान का आइडिया केवल मुस्लिम कट्टरवादिता से ओतप्रोत नहीं था, बल्कि दोनों मुल्कों में अमन चैन रहे, इसलिए यह एक सोचा-समझा फैसला था।
कसौली में खुशवंत सिंह लिटफेस्ट के पहले दिन के दूसरे सेशन में ‘क्रिएटिंग ए न्यू मदिना एन आइडिया ऑफ पाकिस्तान’ पर खुली बहस करते हुए इतिहासकार और इस किताब के लेखक वेंकट धूलिपाला ने कुछ रोचक तरह से प्रश्नों के जवाब देते हुए अपनी बात
रखी। भारत-पाक विभाजन को जिंदगी का सबसे बड़ा दर्द बताने वाले सदी के महान स्वर्गीय लेखक खुशवंत सिंह के साहित्यिक मंच पर पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद और जाने-माने साहित्यकार दलीप सिंह मौजूद रहे।
खुली बहस में इस बात का जिक्र हुआ कि जिन्ना के कांग्रेस से मतभेद उसी समय शुरू हो गए थे, जब 1918 में भारतीय राजनीति में गांधीजी का उदय हुआ। गांधीजी ने राजनीति में अहिंसात्मक सविनय अवज्ञा और हिंदू मूल्यों को बढ़ावा दिया। सत्य, अहिंसा और सविनय अवज्ञा से स्वतंत्रता और स्वशासन पाया जा सकता है, जबकि जिन्ना का मत उनसे अलग था।
जिन्ना की थी ये विचारधारा
जिन्ना का मानना था कि सिर्फ संवैधानिक संघर्ष से ही आजादी पाई जा सकती है। यहीं से पाकिस्तान की नींव रखी गई। कांग्रेस ने खिलाफत आंदोलन का समर्थन किया था, जबकि जिन्ना ने इसका खुलकर विरोध किया। जिन्ना मानते थे कि इससे धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा मिलेगा। 1940 के लाहौर अधिवेशन में प्रस्ताव पारित कर कहा गया कि मुस्लिम लीग का मुख्य उद्देश्य पाकिस्तान का निर्माण है। कांग्रेस ने इसे अस्वीकार कर दिया।
मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे नेताओं और जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठनों ने इसकी कड़ी निंदा की। लिहाजा, जिन्ना ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन की मदद की थी और 1942 में उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया था। यूनियनिस्ट नेता सिकंदर हयात खान की मृत्यु के बाद पंजाब में भी मुस्लिम लीग का वर्चस्व बढ़ गया। 1944 में गांधीजी ने बंबई में जिन्ना से चौदह बार बातचीत की, लेकिन हल कुछ भी न निकला।
आंतरिक सुरक्षा में कमी से उड़ी हमला, सर्जिकल स्ट्राइक पर भी अलग दिखी राय
अखिलेश महाजन। लिटफेस्ट के बहाने साहित्यकारों और राजनेताओं ने भारत के आंतरिक सियासी, सैन्य और सेक्युलरिज्म माहौल पर चोट की। देश की भीतरी परिस्थितियों को चिंताजनक करार देते हुए पाकिस्तान और चीन बॉर्डर पर बढ़ते तनाव को जोड़कर एक नई राजनीतिक बहस छेड़ दी। ब्रेकिंग द बैरियर थीम पर आधारित लिटफेस्ट में वक्ताओं ने कहा कि देश का सियासी रंग सरहदों का माहौल बिगाड़ता है।
1962 में चीन युद्ध में भारत की हार से लेकर 26/11, देश के सैनिकों पर उड़ी हमले जैसी चिंताजनक वारदातों और जवाबी कार्रवाई के रूप में सर्जिकल स्ट्राइक पर उस दौरान की सरकारों को घेरा। जेएनयू कैंपस में देश विरोधी नारे लगाने के आरोपों से घिरे कन्हैया लाल
ने इंडिया हैज मैनी फेसिस में मोदी सरकार को सैन्य नेशनलिज्म फैलाने वाली सरकार करार दिया। उन्होंने कहा कि स्वार्थपूर्ति को सेना का प्रयोग गलत है। आजकल सरकार विशेष समुदाय का पहनावा खानपान और संस्कृति थोपने पर लगी है। यदि बिहार के किसी व्यक्ति का दाल-चावल खाना उसकी संस्कृति में है तो केरल में बीफ खाने वालों को मनाही क्यों?
चीन युद्ध में हार का जिम्मेवार नेहरू गांधी परिवार
सैन्य मसलों के इतिहासकार शिव कुणाल वर्मा के 1962 के भारत-चीन युद्ध पर लिखी किताब द वार देट वाजंट में हार का जिम्मेवार नेहरू गांधी और सैन्य के टॉप ऑफिशियल (सेना कार्यक्षेत्र में छेड़छाड़) को ठहराया। देश के जवानों पर हुए आतंकी हमलों पर सरकार और आंतरिक सुरक्षा में समन्वय की कमी और कमजोरी बताया।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने मीडिया से बातचीत में सर्जिकल स्ट्राइक और आतंकी बुरहान के मामले को यूपी और पंजाब के इलेक्शन तक जोड़ दिया। लेफ्टिनेंट जनरल अता हुसैन ने राजनीतिक न बनाकर सेना को खुला हाथ देने की बात कही। गुलपनाग, पवन शर्मा और मधु किशवर ने कड़वाहट भरे सेशन पर मिठास बिखेरने एकता और सौहार्द की बात कही।
आज कारगिल पर होगा मंथन
रविवार को अंतिम सेशन में लेफ्टिनेंट जनरल मोहिंद्र पुरी (रिटार्यड), लेफ्टिनेंट जनरल अता हुसैन और केजे सिंह कारगिल युद्ध पर मंथन करेंगे और खामियों को उजागर करेंगे। खुशवंत सिंह की मी द जोकरमैन किताब पर चर्चा होगी। कार्यक्रम का अंत गिलियन राइट की प्रेजिडेंशियल रिट्रीट ऑफ इंडिया से होगा।
देश में 1962 के युद्ध जैसे हालात, ठीक नहीं सेना से छेड़छाड़
फिल्म निर्माता, सैन्य मसलों के हिस्टोरियन और लेखक शिव कुनाल वर्मा ने भारत-पाकिस्तान और चीन की सरहदों पर बढ़ते तनाव पर चर्चा की। दूसरे दिन के पहले सेशन में 1962 में भारत-चीन युद्ध पर लिखी विवादित किताब द वार देट वासंट पर साहित्यकार महरूफ रजा के साथ बेबाक डिस्कशन किया।
प्रश्न उठाए कि क्या 1962 में भारत के सैकड़ों सैनिकों की जान गंवाने वाला चीन युद्ध बनता था? उस समय सेना के सिस्टम से छेड़छाड़ हुई। सेना की टॉप लीडरशिप ने फील्ड में तैनात अफसरों (लेफ्टिनेंट जनरल कॉल) की बात नहीं मानी। भारत-पाक के मसले में भी इन दिनों कुछ ऐसा ही हो रहा है।
पिछले चार वर्षों में कश्मीर में फौज का जो ग्रिड था, उसके साथ सेना की टॉप लीडरशिप ने छेड़छाड़ की। जून 2015 में चंडेल और अब उड़ी में सैनिकों को शहीद होना पड़ा। तंबुओं में ऑयल टैंक रखे थे, जिससे ज्यादा नुकसान हुआ। ऐसा संभव नहीं कि हमारे बीच में कोई लीक नहीं है। हमें राजनीतिक और डिफेंस में मजबूत होना होगा।
चीन ने 1950 में किया तिब्बत पर कब्जा
पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि चीन ने पहले सिंकेन को कब्जाया और फिर 1950 में तिब्बत पर कब्जा कर लिया। तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल ने भी चिट्ठी में इसका जिक्र किया था कि हमें अपनी सीमाओं पर चौकसी रखनी चाहिए। उस चिट्टी के दो सप्ताह बाद ही उनका देहांत हो गया और फिर इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई
प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू खुद को शांतिदूत की भूमिका में विश्व को दिखाना चाहते थे। उस समय वे पॉवरफुल थे, उनके खिलाफ कोई बोल नहीं सकता था। आज ऐसा मोदी सरकार में है। वे भी पूरी तरह शक्तिशाली हैं।
प्रेशर में कुछ भी कर सकता है पाक
उन्होंने हिदायत दी कि सर्जिकल स्ट्राइक पहली घटना नहीं है। ऐसा पहले भी कई बार हो चुका है। अब इस मुद्दे को छोड़ देना चाहिए, नहीं तो पाकिस्तान प्रेशर में आकर कुछ करेगा। फिर उसके जवाब में हम करते रहेंगे।
पाकिस्तान से बंद नहीं होनी चाहिए बातचीत: अय्यर
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री मणिशंकर अय्यर ने कहा कि भारत को पाकिस्तान से बातचीत बंद नहीं करनी चाहिए। दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय वार्ता से ही आतंकवाद कम होगा। लिटफेस्ट में पत्रकारों से अनौपचारिक बातचीत में उन्होंने कहा कि मनमोहन सरकार के दौरान वर्ष 2004 से 2007 के बीच देश में आतंकी गतिविधियां कम हो गई थीं।
दोनों देशों के बीच वार्ता का दौर चला हुआ था। मोदी सरकार तो शिमला समझौते की अनदेखी कर रही है। दोनों देशों में बातचीत टूटने से देश में आतंकी गतिविधियां बढ़ेंगी। गोवा में ब्रिक्स सम्मेलन पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसके सदस्य देशों में बिखराव है। यह कामयाब नहीं होगा।
कहा कि मोदी सरकार की गलत विदेश नीति के कारण भारत ने अपना सबसे अच्छे दोस्त रूस को खो दिया है। आज यह स्थिति हो गई है रूस की फौज पाकिस्तान के साथ अभ्यास कर रही है। ब्रिक्स के दूसरे सदस्य देश चीन पर चर्चा करते हुए कहा कि चीन हमेशा से पाकिस्तान का दोस्त रहा है।
चीन और पाक मिलकर सीपीईसी सड़क का निर्माण कर रही है। इसके कारण ईरान भी इन दोनों देशों के साथ जुड़ रहा है। उन्होंने केंद्र सरकार को चेताया की ईरान भी हमारे साथ नहीं है। हालांकि मोदी सरकार इसे अपना दोस्त बता रही है। उन्होंने 56 इंच की विदेश नीति को पूरी तरह फेल बताया।
पंजाब के चुनाव नहीं लडूंगी, प्रचार करूंगी: गुल पनाग
अभिनेत्री टर्न पॉलिटिशियन गुलपनाग ने कहा कि वे पंजाब में चुनाव नहीं लडे़ंगी, बल्कि पार्टी के लिए देश के हर कोने में प्रचार करेंगी। केंद्र सरकार जैसी कार्रवाई आप विधायकों के मामले में कर रही है, वैसी ही अन्य विधायकों के ऊपर भी होनी चाहिए। सरकार को सभी को एक समान देखना चाहिए।
ऐसा नहीं है कि सिर्फ आप के विधायक ही विवादों में हैं, देश में अन्य जगह भी कई विधायक हैं, जो मर्डर और अन्य मामलों में फंसे हैं। गुलपनाग खुशवंत सिंह लिटफेस्ट में हिस्सा लेने कसौली आई हैं। कहा कि आरोप लगाने मात्र से कोई दोषी नहीं हो जाता। न्यायालय में जजमेंट आने के बाद सच्चाई सामने आती है।
चंडीगढ़ से आप टिकट पर सांसद का चुनाव लड़कर तीसरे नंबर पर रहीं गुलपनाग चुनाव लड़ने के प्रश्न पर बोलीं - वे अपनी निजी कमिटमेंट्स के कारण व्यस्त हैं। इसलिए चुनाव नहीं लड़ पाएंगी, लेकिन पंजाब और गोवा में होने वाले विधानसभा चुनावों में पार्टी के लिए प्रचार करेंगी।
पंजाब में आप की सरकार बनती है तो क्या सीएम कैंडिडेट के लिए कोई सिख होगा तो कहा कि सीएम के लिए कोई भी प्रत्याशी हो सकता है, लेकिन अभी इस पर बात करना जल्दबाजी होगी। आने वाली फिल्मों के बारे में कहा कि हाल ही में दिलजीत दोसांझ के साथ पंजाबी फिल्म अंबरसरिया की थी। अभी अपने ही कामों में व्यस्त होने के कारण इसके लिए समय नहीं दे पा रही हूं।