रंधावा ने कहा कि सतलुज का बेसिन हिमाचल में है। यह चीन से शुरू होता है। इसे स्पीति बेसिन और बास्पा बेसिन के ग्लेशियरों से पानी मिलता है। ग्लेशियरों के पिघलने से सबसे ज्यादा झीलें सतलुज बेसिन में चीन सीमा के आरपार बन रही हैं।
गीपांगगत ग्लेशियर के आगे सिस्सू नाले पर ये जो झील है, इसका रकबा वर्ष 1965 में 27 हेक्टेयर था और अब 118 हेक्टेयर हो गया है। इसके बारे में जिला प्रशासन को बताया है कि जिस तरह की यह झील है, इसको वैज्ञानिक तरीके से ब्लास्ट करना बहुत जरूरी है।
ये अगर बह जाती है तो सबसे पहले सिस्सू नाले में इससे बाढ़ आएगी, जो निचले क्षेत्रों में तबाही मचा सकती है। डाॅ. रंधावा ने बताया कि ग्लेशियरों में बर्फ जमा तो हो रही है, मगर यह जल्दी पिघल रही है।
पहले हिमपात नवंबर, दिसंबर में ज्यादा होता था, अब फरवरी, मार्च और अप्रैल यहां तक कि मई तक हो रहा है। बर्फबारी लेट होन से इसमें वाटर कंटेट बढ़ गया है। इससे यह जल्दी मेल्ट कर रही है। हालांकि, इस बार सुखद यह है कि ग्लेशियरों में 25 प्रतिशत बर्फ बढ़ी है।
गाड़ियों का कार्बन पिघलकर ग्लेशियरों पर बना रहा ब्लैक बॉडी
गाड़ियों के चलने से जो कार्बन निकल रहा है, वह ग्लेशियरों पर जमा हो रहा है। ये ग्लेशियरों की ब्लैक बॉडी बना रहा है। इससे भी ग्लेशियर पिघल रहे हैं। विदेशी शोधार्थियों का इस पर शोध सामने आया है।