श्राद्ध पक्ष के दौरान राजधानी शिमला के लोगों को पितरों का तर्पण करने के लिए कौवे ढूंढे नहीं मिल रहे। औपचारिकता के लिए ही कौवों को ग्रास डाला जा रहा है। मान्यता है कि श्राद्ध से पहले गाय, कुत्ते और कौवे को ग्रास देना जरूरी होता है। गाय और कुत्ते के बाद कौवे के लिए घरों की छतों पर डाले जाने वाले ग्रास को बंदर चट कर रहे हैं।
आचार्य योगेंद्र शर्मा ने कहा कि कौवों को पितरों का दूत माना जाता है, श्राद्ध पक्ष में कौवा घर पर बैठकर आवाज करे तो माना जाता है कि पितर आए हैं। इसलिए श्राद्ध पक्ष के दौरान पूर्वज के श्राद्ध के दिन ब्राह्मण को भोजन कराने से पहले कौवों के लिए घर की छत पर भोजन रखा जाता है।
कौवा अगर भोजन से चोंच भी लगा दे तो माना जाता है कि पितरों ने भोजन ग्रहण कर लिया। लेकिन अब शहरों में कौवे पहले के मुकाबले बहुत कम दिखते हैं। मिडल बाजार शिव मंदिर के पंडित हेमराज शर्मा ने कहा कि श्राद्ध पक्ष के दौरान गाय, कुत्ते और कौवे को ग्रास देने का महत्व है।
ग्रास में संकल्प का महत्व होता है। इसके बाद कोई अन्य जीव भी खाए तो दोष नहीं लगता। लोग संकल्प के बाद कौवे के लिए ग्रास घराें की छत पर रख देते हैं। कौवे के ग्रास को अगर कोई अन्य जीव खाए तब भी श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध करने वाले को पूरा फल मिलता है।
कीटनाशकों और रेडिएशन का पड़ रहा बुरा प्रभाव
जानकारों का कहना है कि फसलों में कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल, मोबाइल टावरों की रेडिएशन और प्रदूषण के कारण शहरों में कौवों सहित अन्य पक्षियों के लिए प्रतिकूल हालात पैदा कर दिए हैं।
वन विभाग भी कौवों की संख्या से अनभिज्ञ
वन विभाग के पास ऐसी कोई आधिकारिक जानकारी नहीं है कि शहर में कौवों की संख्या पहले के मुकाबले कितनी कम हुई है। विभाग के पास कौवों की संख्या में कमी या बढ़ोतरी के भी आंकड़े मौजूद नहीं है।