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Shimla News: नाबालिग के मामले में दो माह में चालान पेश न करने पर पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ा रुख

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जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड शिमला ने पुलिस थाना छोटा शिमला की रिपोर्ट वापस करने के दिए आदेश
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संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। किशोर न्याय बोर्ड शिमला ने चाइल्ड इन कनफ्लिक्ट विद लॉ से जुड़े एक मामले में निर्धारित समय सीमा दो माह के भीतर अंतिम रिपोर्ट (चार्जशीट/चालान) पेश न करने पर पुलिस कार्यप्रणाली पर कड़ा रुख अपनाया है। बोर्ड की प्रधान मजिस्ट्रेट प्रतिभा नेगी और सदस्यों प्रियंका खनाल व निरंजना कंवर की पीठ ने पुलिस थाना छोटा शिमला की ओर से दायर फाइनल रिपोर्ट को नियमों के उल्लंघन के चलते तत्काल वापस लौटाने के आदेश दिए हैं। साथ ही इस आदेश की प्रति शिमला के पुलिस अधीक्षक (एसपी) को भी भेजने के निर्देश जारी किए गए हैं।
पुलिस थाना छोटा शिमला में 24 फरवरी 2026 को बीएनएस की धारा 117 (2) और 3 (5) के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी। जांच के दौरान जांच अधिकारी के संज्ञान में आया कि मामले में शामिल एक आरोपी नाबालिग है जिसे 16 अप्रैल 2026 को पूछताछ के बाद उसके पिता की सुरक्षित सुपुर्दगी में सौंप दिया गया था। इसके बाद पुलिस ने इस मामले की अंतिम रिपोर्ट 31 जुलाई 2026 को जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के समक्ष दायर की थी। बोर्ड ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए पाया कि एफआईआर दर्ज होने की तिथि से दो माह की निर्धारित अवधि 23 अप्रैल 2026 को ही समाप्त हो चुकी थी। पुलिस ने रिपोर्ट में यह स्पष्ट नहीं किया कि आईओ को आरोपी के नाबालिग होने की जानकारी किस तारीख को मिली, जबकि 16 अप्रैल 2026 को किशोर को उसके पिता को सौंपे जाने से स्पष्ट है कि उस दिन पुलिस को उसकी उम्र का पूर्ण ज्ञान था। इसके बावजूद रिपोर्ट 31 जुलाई को पेश की गई जो कि जानकारी मिलने की तारीख से भी दो महीने की समय सीमा बीत जाने के बाद दाखिल की गई। बोर्ड ने रेखांकित किया कि किशोर न्याय नियम, 2016 के नियम 10 (6) के तहत गंभीर या सामान्य अपराधों में किशोर के खिलाफ दो महीने के भीतर रिपोर्ट पेश करना अनिवार्य है। केवल उन्हीं परिस्थितियों में राहत मिल सकती है जहां किशोर होने की जानकारी न हो और अभियोजन पक्ष ने समय सीमा बढ़ाने के लिए विधिवत अर्जी दायर की हो। इस मामले में पुलिस ने देरी माफी या समय बढ़ाने का कोई आवेदन नहीं दिया था।
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बोर्ड ने दिया हाईकोर्ट के आदेशों का हवाला
बोर्ड ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के स्टेट ऑफ एचपी बनाम अंकित और स्टेट ऑफ एचपी बनाम सौरभ सहित सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया। कोर्ट के फैसलों के अनुसार जेजे एक्ट के प्रावधान बच्चों के सर्वोत्तम हित के लिए बनाए गए हैं और दो महीने के भीतर रिपोर्ट पेश न करना नियमों का खुला उल्लंघन है। बोर्ड ने माना कि निर्धारित समय सीमा के बाद बिना अनुमति दायर रिपोर्ट स्वीकार्य नहीं है जिसके चलते इसे संबंधित थाने को तुरंत लौटाने के निर्देश दिए गए हैं।
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