मंडी शहर में विरोध रैली निकाली गई। रैली का नेतृत्व सीटू के राज्य अध्यक्ष विजेंद्र मेहरा, संयुक्त संघर्ष समिति के संयोजक भूपेंद्र सिंह और राजेश शर्मा, इंटक के वाईपी कपूर, एसकेएस के संत राम और शोभे राम भारद्वाज, टीयूसीसी के रविंद्र कुमार रवि, भवन निर्माण कामगार संघ के अमन चौधरी और एटक के ललित ठाकुर ने किया।
राज्य श्रमिक कल्याण बोर्ड से मंडी जिले के पंजीकृत 80 हजार मनरेगा व निर्माण मजदूरों की वित्तीय सहायता गैर कानूनी तौर पर रोकने का आरोप लगाकर मंगलवार को सरकार के खिलाफ पांच मजदूर संगठनों ने मिलकर प्रदर्शन किया गया। इस दौरान मंडी शहर में विरोध रैली निकाली गई। रैली का नेतृत्व सीटू के राज्य अध्यक्ष विजेंद्र मेहरा, संयुक्त संघर्ष समिति के संयोजक भूपेंद्र सिंह और राजेश शर्मा, इंटक के वाईपी कपूर, एसकेएस के संत राम और शोभे राम भारद्वाज, टीयूसीसी के रविंद्र कुमार रवि, भवन निर्माण कामगार संघ के अमन चौधरी और एटक के ललित ठाकुर ने किया। सभी मजदूर संगठनों के सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने सेरी मंच पर एकत्र होकर शहर में पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ रैली निकाली और सुक्खू सरकार के खिलाफ जोरदार नारेबाजी की।
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उपायुक्त कार्यालय के मुख्य द्वार पर जनसभा आयोजित की गई। सीटू के राज्य अध्यक्ष विजेंद्र मेहरा और संयुक्त संघर्ष समिति के राज्य संयोजक व बोर्ड के सदस्य भूपेंद्र सिंह ने बताया कि गत माह घुमारवीं में बनी योजना के अनुसार जिला स्तर पर प्रदर्शन किए जा रहे हैं और उसी की कड़ी में मंडी में पहली विरोध रैली आयोजित की गई। इसके माध्यम से मुख्यमंत्री तथा श्रम मंत्री को उपायुक्त के माध्यम से मांगपत्र भेजा गया। उन्होंने बताया कि सुक्खू के नेतृत्व में राज्य सरकार ने मनरेगा व निर्माण मजदूरों को श्रमिक कल्याण बोर्ड से बाहर करने और उनकी सहायता रोकने का फैसला 12 दिसंबर 2012 को लिया था जिसके खिलाफ सभी ट्रेड यूनियनों ने विरोध किया।
लेकिन सरकार ने प्रदेश के साढ़े चार लाख मजदूरों के करोड़ों रुपये की सहायता रोक दी है। 30 जनवरी को मंडी और कुल्लू में रैलियां की गईं। 31 जनवरी को बंजार, 1 फरवरी को शिमला, रोहड़ू और रामपुर, 5 को हमीरपुर, 7 धर्मशाला, 8 ऊना और 9 को बिलासपुर में विरोध रैली होगी। उसी दिन संयुक्त संघर्ष समिति की बैठक बिलासपुर में आयोजित करके अगली योजना तैयार की जाएगी। बोर्ड सदस्य व टीयूसीसी के राज्य महासचिव रविंद्र कुमार रवि ने बताया कि हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस पार्टी के लिए यह फैसला आत्मघाती होगा और दो महीने बाद होने वाले लोकसभा चुनावों में उन्हें इसके परिणाम भुगतने पड़ेंगे।