सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट की ओर से पारित कॉमन कॉज बनाम भारत संघ (1993) मामले में दिए गए ऐतिहासिक फैसले और उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 की धारा 28 का हवाला देते हुए इस पुनर्गठन की वैधता पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य में यदि किसी उपभोक्ता को छोटी सी शिकायत के लिए अपने जिले से दूसरे जिले जैसे लाहौल-स्पीति से कुल्लू या किन्नौर से शिमला जाना पड़े तो यह उसके लिए आर्थिक और शारीरिक रूप से बोझ बन जाता है। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 28 स्पष्ट कहती है कि प्रत्येक जिले में एक स्वतंत्र आयोग होना चाहिए। अधिसूचना के माध्यम से आयोगों को क्लब या री-ग्रुप करना इस कानूनी प्रावधान की भावना के विपरीत है। याचिकाकर्ता का कहना है कि जब कानून हर जिले में आयोग की बात करता है, तो सरकार उसे प्रशासनिक आदेश से सीमित नहीं कर सकती।