प्रदेश के हजारों किसान-बागवान बंदरों के आतंक से किसानी-बागवानी छोड़ चुके हैं। सरकार बंदर के हमले के घायलों को पचास लाख से ज्यादा बतौर मुआवजा दे चुकी है।
तेरह साल में सरकार इस समस्या से निपटने के करीब दस करोड़ से ज्यादा खर्च कर चुकी है। सवा लाख से ज्यादा बंदरों की नसबंदी करने का भी दावा किया जाता रहा है। हालांकि, बंदरों की समस्या अब भी जस की तस है।
ईको टास्क फोर्स को देने की थी बंदर मारने की तैयारी
वन्यजीव अधिनियम के चलते वन विभाग बंदरों को खुद नहीं मार सकता। इसलिए वीरभद्र सरकार के दौरान गठित एक हाई पावर कमेटी ने तय किया था कि अगर पंचायत या किसान-बागवान आवेदन करें तो ईकोे टास्क फोर्स बंदरों को मारने में मदद कर सकती है। इस हाई पावर कमेटी में वर्तमान मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर उस समय बतौर सदस्य शामिल थे।
अन्य राज्यों ने की है केंद्र से मांग
केंद्र ने हिमाचल से वर्मिन पर स्टेट रिपोर्ट इसलिए मांगी है, क्योंकि बड़ी संख्या में वन्यजीव संगठन इसके औचित्य पर सवाल उठा रहे हैं। कई अन्य राज्यों ने भी बंदरों को वर्मिन घोषित करने के लिए आवेदन किया है। ऐेसे में सरकार यह जानना चाह रही है कि हिमाचल में वर्मिन घोषित करने का परिणाम क्या रहा है।
फील्ड से मांगी विभाग ने रिपोर्ट
प्रदेश के मुख्य वन्यजीव वार्डन डॉ. आरसी कंग ने केंद्र से पत्र मिलने की पुष्टि की है। कहा कि सभी डीएफओ को पत्र लिखकर रिपोर्ट मांगी है। इसके बाद विस्तृत रिपोर्ट केंद्र को भेजी जाएगी।