पेड़ पर सीमेंट से भरी गई खोखली जगह।
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हिमाचल प्रदेश के सेब बागवानी क्षेत्रों में सीमेंट के प्लास्टर (लेप) से सेब के बूढ़े पेड़ों को सड़ने से बचाया जा रहा है। कई क्षेत्रों में सेब बागवानों ने यह सफल प्रयोग किया है। यह तकनीक बहुत सस्ती है। इसे वहां अपनाया जा रहा है, जहां पुराने सेब के पेड़ों के तनों में गड्ढे बन गए हों।
वहां रेत और सीमेंट के मिश्रण का लेप किया जा रहा है। इस तकनीक का प्रयोग शिमला, कुल्लू, मंडी आदि जिलों के कई सेब बागवान कर रहे हैं। इसके पीछे मकसद यही है कि सेब के पेड़ों को जल्दी सड़ने से बचाया जाए। अगर सेब के तने या मोटी टहनी सड़ने से गड्ढा बन गया है तो सबसे पहले इसे साफ किया जाता है।
खरोचकर इससे सड़ा भाग निकाल दिया जाता है। उसके बाद रेत और सीमेंट को मिलाकर इसे उस खोखले भाग में भरा जाता है। जब यह भर जाए तो इसे बाहर तने की त्वचा में भी कम से कम दो सेंटीमीटर तक लेपा जाता है, जिससे इस क्षतिग्रस्त भाग के अंदर पानी किसी भी सूरत में न घुस पाए।
जिला शिमला की ग्राम पंचायत कमाह के गांव गोथू के कांत बाग के मालिक बागवान कुलदीप कांत शर्मा ने कहा है कि उनकी तरह कई बागवान इसका सफल प्रयोग कर चुके हैं। इससे पुराने पेड़ों को जल्दी सड़ने से बचाया जा सकता है। ऐसे पेड़ों से लंबे समय तक फसल ली जा सकती है।
कारगर है तकनीक
डॉ. वाईएस परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय नौणी में निदेशक विस्तार रह चुके डॉ. एसपी भारद्वाज का कहना है कि इस तकनीक का इस्तेमाल पुराने पेड़ों पर ही किया जाता है, जिनकी उम्र 30 से 45 साल तक की हो। तने या मोटी टहनी के खोखले भाग को सीमेंट से भर दिया जाए तो इसमें पानी नहीं घुसेगा और सड़ना रुक जाएगा। इससे पेड़ फसल देता रहेगा और जल्दी नहीं सड़ेगा। यह प्रयोग कई क्षेत्रों में किया जा चुका है और यह कारगर रहा है।