सूत्रों के अनुसार जांच में सामने आया है कि जिन सिफारिशी उम्मीदवारों को नौकरी पर रखना था, उनके लिखित परीक्षा में 50 फीसदी अंक आने के बावजूद साक्षात्कार में 90 फीसदी अंक दे दिए गए।
147 उम्मीदवार ऐसे थे, जिन्होंने लिखित परीक्षा में 90 और इससे अधिक फीसदी अंक हासिल किए थे। उन्हें साक्षात्कार में तय अंकों में से अधिकतम 20 फीसदी अंक ही दिए गए। इस वजह से लिखित में 90 फीसदी अंक लेकर भी ये अभ्यर्थी बाहर हो गए।
24 अक्तूबर 2003 को बीओडी की बैठक में कंडक्टरों के 300 पद भरने की मंजूरी दी गई। इनमें सामान्य वर्ग के 166, ओबीसी 54, एससी 66 और एसटी के 14 पद भरे जाने थे। इन पदों के लिए प्रदेश भर से 17 हजार 890 आवेदन आए।
20 सितंबर 2004 को इन पदों पर 300 की जगह 365 पद भर दिए गए। 12 मई 2005 को 13 और पद भर दिए गए। सूत्र बताते हैं कि यह बात जांच में सामने आई कि भर्ती प्रक्रिया पारदर्शी नहीं हुई।
कोर्ट के आदेश पर शिमला पुलिस ने 14 मार्च, 2017 को तत्कालीन एमडी, डीएम समेत पांच लोगों को आरोपी बनाकर थाना सदर में एफआईआर दर्ज की। कांग्रेस सरकार में जांच धीमी रही, लेकिन अब इस मामले में एसआईटी का गठन हुआ है।
इसमें डीएसपी सिटी दिनेश शर्मा, एएसआई इंद्र सिंह, हेडकांस्टेबल रमेश, शिव देव और कांस्टेबल पंकज को शामिल किया गया है। डीएसपी सिटी ने कहा कि भर्ती से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध करवाने के लिए निगम को 91 सीआरपीसी का नोटिस भेजा है। इसमें तीन डिवीजन का रिकार्ड मांगा है।