फिल्म ‘दंगल’ की तरह यहां न तो महावीर सिंह फोगट जैसे नेशनल खेल चुके पिता कोच हैं। न ही महिला पहलवानी को लेकर सुविधाएं। लेकिन है तो बस बुलंद हौसला। जी हां, तमाम असुविधाओं से संघर्ष करते हुए अपने दम पर दो बार स्टेट में गोल्ड जीत चुकी 24 वर्षीय प्रिया इस बुलंद हौसले का उदाहरण है। प्रदेश की युवा रेसलर को मलाल इस बात का है कि तीन बार नेशनल खेलने के बावजूद प्रदेश का परचम न फहरा सकी।
आगे कहती हैं कि आधुनिक कोचिंग के अलावा डाइट, खेलने व वर्कआउट के लिए नेशनल स्तर की सुविधा और सिंथेटिक मैट मिल जाए तो वह भी ‘दंगल’ की गीता फोगट की तरह इंटरनेशनल स्तर पर देश के लिए गोल्ड लाने का दम रखती हैं। लेकिन अफसोस इस महिला खिलाड़ी के लिए युवा सेवाएं एवं खेल विभाग के पास बजट तक का प्रावधान नहीं है।
पिकअप चलाते हैं पिता
बस एसोसिएशन में रसूखदारों को शामिल करके बजट का जुगाड़ किया जाता है। राष्ट्रीय खिलाड़ी प्रिया ने प्रदेश सरकार से वूमेन रेसलिंग के लिए बजट के अलावा स्कूली स्तर पर रेसलिंग को को अनिवार्य करने की मांग की है। अन्य राज्यों के मुकाबले हिमाचल में महिला रेसलिंग में महिलाओं की संख्या काफी कम है।
इसका कारण प्रदेश में इस खेल के प्रति जागरूकता की कमी है। प्रिया सलोड़ा में जन्मी और वहीं स्कूल में उसकी शिक्षा हुई। उसके पिता पिकअप चलाते हैं। प्रिया ने 2014 में कॉलेज में कला संकाय में दाखिला लिया। सोलन कालेज में महिला रेसलिंग होती थी। वहीं से उसकी रुचि पैदा हुई। कोच सुरेश सूर्या से रेसलिंग के गुर सीखे। 2014 में कड़े परिश्रम से स्टेट में मेडल जीता।
न महिला कोच और न ही इंडोर स्टेडियम
2015 में भी स्टेट चैंपियन रहने के बाद वह उसी साल पहला नेशनल उत्तर प्रदेश में खेली, जहां वह बेस्ट आठ में पांचवें स्थान पर रही। इसके बाद दोबारा चयन राष्ट्रीय खेलों के लिए हुआ, जो केरल में 2015 में हुईं। साल 2015 में ही दिल्ली में राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में अच्छा प्रदर्शन किया। लेकिन मेडल से चूक गई। हाल ही में बैजनाथ में हुई अंतर महाविद्यालय कुश्ती प्रतियोगिता में प्रिया ने 63 किलो भार वर्ग में गोल्ड जीता।
सोलन की अन्य रेसलर निधि, आरती, रुचि, तनु कुमारी, राधा, सोनी और मोनिका का कहना है कि हिमाचल में कोई भी महिला कोच नहीं है। इंडोर स्टेडियम नहीं है। इससे प्रेक्टिस में मुश्किलें आती हैं। खिलाड़ियों को यह भी पता नहीं होता कि कौन सा डाइट चार्ट फालो करना है। साथ ही रेसलिंग में उपयोग होने वाला सामान जैसे जूते, ट्रैक सूट, सिंथेटिक गद्दे आदि भी खिलाड़ियों की पहुंच से परे हैं। हालांकि इस साल शूलिनी मेले के दौरान उपायुक्त ने सभी खिलाड़ियों को किट दी थी।
उधर, जिला खेल अधिकारी विजय ठाकुर का कहना है कि प्रदेश सरकार की ओर से महिला रेसलरों को कोच मुहैया करवाया जाता है। इसके अलावा सारा खर्च खिलाड़ी अपने दम पर या एसोसिएशन भी उठाते हैं। हालांकि सोलन जिला प्रशासन की ओर से इस वर्ष खिलाड़ियों को काफी सहायता दी गई है।