राज्य लोक सेवा आयोग की ओर से ली गई एचएएस परीक्षा के टॉपर मनमोहन सिंह ने ये साबित कर दिया है कि सरकारी पाठशालाएं कान्वेंट या प्राइवेट स्कूलों से बेहतरीन नतीजे दे सकती हैं। मनमोहन सिंह शिमला के दुर्गम पंद्रह-बीस क्षेत्र के अपने गांव शमकोर से बचपन में रोज चार किलोमीटर पैदल चलकर जघोड़ी स्कूल पहुंचते थे।
राजकीय उच्च पाठशाला जघोड़ी से उन्होंने दसवीं कक्षा तक की पढ़ाई की। फिर उन्होंने रामपुर की राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला से जमा दो और इसके बाद स्थानीय सरकारी कॉलेज से बीकॉम किया। उसके बाद जब एमकॉम करने एचपीयू शिमला आए तो उनके जीवन को यहां नई दिशा मिली। उन्होंने प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी शुरू की। आज उन्हें अपना मुकाम हासिल हो चुका है।
पहले आठ घंटे लेकिन अब तीन से चार घंटे रोज पढ़ाई
मनमोहन सिंह ने बताया कि उनका चयन एलाइड परीक्षा में जिला रोजगार अधिकारी के रूप में 2014 में हुआ। तबसे वह रिकांगपिओ में कार्यरत हैं। इससे पहले 2006 में पहली नेशनल सैंपल सर्वे में सांख्यिकी अन्वेषक बने और 2010 तक रहे। फिर एजी कार्यालय शिमला में सहायक लेखा परीक्षा अधिकारी 2014 तक रहे।
मनमोहन बताते हैं कि इन नौकरियों के मिलने से पहले तो वह आठ घंटे तक पढ़ते थे, मगर पिछले कुछ वक्त से केवल तीन से चार घंटे ही सुबह-शाम पढ़ाई कर पा रहे थे। ये पढ़ाई निरंतर रही। उनके ऐच्छिक विषय भी शुरू से लेकर ही वाणिज्य और लोक प्रशासन रहे हैं।
हालांकि, वे समसामयिक सूचनाओं से अपडेट रहते थे। इसमें उनके सीएचटी पद से सेवानिवृत्त पिता कृष्णदास, पत्नी सपना कुमारी और फर्स्ट क्लास में पढ़ रही बिटिया कनुप्रिया का बहुत योगदान रहा। मां कला देवी का देहांत वर्ष 2006 में हो गया था।
तीसरी बार दिया एचएएस की परीक्षा का ये साक्षात्कार
उनका और तमाम गुरुजनों का आशीर्वाद से वह अपने व्यक्तित्व का विकास ठीक वैसे कर पाए, जैसा कि कामयाब होने के लिए जरूरी था। उन्होंने कहा कि उन्होंने एचएएस की परीक्षा का ये साक्षात्कार तीसरी बार दिया है। मनमोहन सिंह बोले कि निरंतर मेहनत कामयाबी का मूल सूत्र है।
स्कूलिंग या पढ़ाई किन परिस्थितियों में हुई, ये मैटर नहीं करता। मेहनत ही मायने रखती है। ईश्वर भी ऐसे में जरूर साथ देता है। मनमोहन सिंह को अपने टॉपर होने की सूचना भी दुर्गम क्षेत्र में मोबाइल फोन में सिग्नल नहीं होने के कारण शनिवार को देर रात को मिली।