पहले जो मजा ढोलकी के साथ खांजरी के बजने से उत्पन्न संगीत पर गाने और नाचने में आता था, वह अब नसीब नहीं हो रहा। खांजरी थाली की तरह नजर आने वाला एक वाद्य यंत्र होता है। इसमें भी बकरे की खाल का पूड़ा होता है। इसके किनारे में पतली-पतली लोहे की पत्तियां होती हैं, जिनमें पायल की तरह छन-छन आवाज आती है।
यह बात महासुवीं पहाड़ी की मशहूर लोकगायिका बसंती देवी ने कही। उन्हें लोकगायकी पर तकनीक के हावी होने का मलाल है। उन्होंने माना कि सूचना-प्रौद्योगिकी के विकास ने लोकसंगीत का बेशक प्रसार किया हो, मगर इसके उस कलेवर को बदल दिया है जो लोक कलाकारों के सदियों चले
रियाज के बाद बना था। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे सस्ती लोकप्रियता के लिए लोकसंगीत के नाम पर फूहड़ता न परोसें। 76 वर्षीय बसंती देवी के लोकगीत आज भी आकाशवाणी शिमला से बजते हैं तो लोग मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। हालांकि, सरकारी कार्यक्रमों में उनकी उपेक्षा हो रही है। उनके गाए ‘राजुआ बोलू हेतुआ भाइया’, ‘मानादासिये हो’, ‘रूंदी लागी चैंखिए रे हाटूअरी टीरअ’ जैसे न जाने कितने अनगिनत लोकगीतों की रेडियो पर आज भी खूब फरमाइशें आती हैं।
बसंती देवी ऐसे परिवार से ताल्लुक रखती हैं जो परंपरागत रूप से लोकसंगीत को समर्पित रहा है। राजो-महाराजाओं के दरबारों में भी लोकसंगीत पेश करता था। 15-16 साल की उम्र में ही उन्होंने लोकगायन शुरू कर दिया था और लोकगायन के साथ ही वह नृत्य भी करती आई हैं। देश भर के कई क्षेत्रों में पहाड़ी लोकगायन और लोकनृत्य की छटा बिखेर चुकीं बसंती देवी अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह तक अपनी लोककला का प्रदर्शन कर चुकी हैं।
उन्हें राज्य कला संस्कृति भाषा अकादमी से लोकगायक के रूप में पेंशन भी मिलती है। बसंती देवी इन दिनों जिला शिमला की ठियोग तहसील के छैला कस्बे में गिरि नदी के तट पर अपने मकान में रहती हैं। उनके बेटे भी लोकगायन करते हैं और औरों से भी गवाते हैं। बेटों ने यहां स्टूडियो भी खोल रखा है, मगर उनकी इसमें बहुत दिलचस्पी नहीं है। उन्हें तो पुरानी तकनीक में ही मजा आता है।
घर-घर लोकगायन और लोकनृत्य कर मनाती थीं नए साल का जश्न
बसंती देवी ने कहा कि वह कई वर्षों तक अपने क्षेत्र में घर-घर लोकगायन और लोकनृत्य के माध्यम से नए विक्रमी संवत्सर और इसके प्रथम महीने चैत्र का परिचय करवाती थीं। यह पहाड़ों की यह परंपरा अब खत्म होती जा रही है। इस दौरान ढोलकी और खांजरी पर वह गाती थीं और नृत्य करती थीं।