वेतन, वरिष्ठता और सेवा लाभ भी नहीं मिल रहे
कुछ बिना पदोन्नति के रिटायर होने की कगार पर
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। राज्य विश्वविद्यालयों में कॅरिअर उन्नयन योजना (सीएएस) पर लगी रोक सीधे हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय (एचपीयू) शिमला के कर्मचारियों के सेवा अधिकारों पर असर डाल रही है। विवि में 2016 के बाद से शिक्षकों की पदोन्नति प्रक्रिया प्रभावित चल रही है। वर्तमान में एचपीयू के करीब 150 शिक्षक पदोन्नति से वंचित हैं जबकि चार शिक्षक ऐसे हैं जो बिना पदोन्नति और उससे जुड़े वित्तीय लाभ प्राप्त किए ही सेवानिवृत्ति के कगार पर पहुंच गए हैं। यह मामला अब उच्च शिक्षा के बजाय कर्मचारियों के सेवा अधिकार और वित्तीय नुकसान का मुद्दा बन गया है। कॅरिअर उन्नयन योजना विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की एक अनिवार्य पदोन्नति व्यवस्था है जिसके तहत शिक्षकों को तय समयावधि में उनके अनुभव, शोध कार्य, प्रकाशन और शैक्षणिक प्रदर्शन के आधार पर अगली श्रेणी में पदोन्नत किया जाता है। यह केवल पदनाम का बदलाव नहीं बल्कि वेतनमान, ग्रेड वेतन, पेंशन और अन्य सेवा लाभों से सीधे जुड़ी प्रक्रिया है।
राज्य में यह प्रक्रिया वर्ष 2016 के बाद से लगातार प्रभावित रही है। प्रशासनिक स्तर पर लगाए गए प्रतिबंधों और स्वीकृति में देरी के कारण पदोन्नति फाइलें लंबित पड़ी हैं। कई मामलों में चयन समितियों की बैठकें तक नहीं हो पा रही हैं जिससे पात्र शिक्षक वर्षों से एक ही पद पर अटके हुए हैं। इस रोक का सीधा असर शिक्षकों की आय और भविष्य पर पड़ रहा है। पदोन्नति न मिलने से जहां वेतन वृद्धि रुक गई है वहीं पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभ भी कम हो रहे हैं। इसमें जिन शिक्षकों की सेवा अवधि समाप्ति के करीब है उनके लिए यह नुकसान स्थायी बनता जा रहा है क्योंकि पदोन्नति का लाभ पिछली तिथि से नहीं मिल पा रहा।
यह सेवा प्रबंधन की विफलता : डॉ. व्यास
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के अध्यक्ष डॉ. नितिन व्यास ने कहा कि कॅरिअर उन्नयन योजना का ठप होना संस्थागत समस्या से ज्यादा सेवा प्रबंधन की विफलता को दर्शाता है। यह योजना शिक्षकों को शोध और अकादमिक प्रदर्शन के लिए प्रोत्साहित करने के साथ उनकी सेवा प्रगति सुनिश्चित करने का मुख्य आधार है। इसके रुकने से न केवल कर्मचारियों में असंतोष बढ़ रहा है बल्कि विश्वविद्यालयों में कार्य संस्कृति भी प्रभावित हो रही है। मौजूदा स्थिति में लंबित मामलों का बढ़ता दबाव और सेवानिवृत्ति के करीब पहुंच रहे शिक्षकों की संख्या इस बात का संकेत हैं कि यदि जल्द निर्णय नहीं लिया तो यह विवाद बड़े कर्मचारी आंदोलन का रूप ले सकता है।