लाहौल में अशोक सिंघल के अस्थि विसर्जन के साथ ही चंद्रा-भागा नदी के तांदी संगम के पुनरुद्धार की कवायद शुरू हो गई है। पारंपरिक छा-छा धार्मिक अनुष्ठान के साथ विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष रहे अशोक सिंघल की अस्थियों का विसर्जन किया गया। अस्थियों को बौद्ध और हिंदू धार्मिक अनुष्ठान से चंद्राभागा में प्रवाहित किया गया।
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अस्थि विसर्जन के साथ ही घाटी में संगम महापर्व का आगाज हुआ। उड़ान न होने से केंद्रीय पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री डॉ. महेश शर्मा कार्यक्रम में शरीक नहीं हो पाए। सांसद रामस्वरूप शर्मा ने महापर्व का शुभारंभ किया। उन्होंने यहां अशोक स्तंभ के निर्माण की घोषणा भी की। हजारों की भीड़ तांदी संगम पर जुटी। संगम महापर्व को हर वर्ष आयोजित किया जाएगा।
तांदी संगम पर सुबह 7 बजे हिंदू और बौद्ध परंपरानुसार धार्मिक अनुष्ठान शुरू हुआ। यह 11 बजे तक जारी रहा। अस्थियों को प्रवाहित करने के साथ तांदी संगम महापर्व शुरू होने की अधिकारिक घोषणा की गई। स्थानीय भाट, लला मेमे फाउंडेशन, गायत्री परिवार और सनातन सभा की ओर से धार्मिक अनुष्ठान पूरा किया गया।
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करीब शताब्दी बाद हुआ छा-छा अनुष्ठान
अस्थि विसर्जन के दौरान सालों बाद संगम में पारंपरिक नगाड़ों के राग बजाए गए। छा-छा अनुष्ठान को करीब शताब्दी बाद संगम पर्व में दोहराया गया। संगम पर्व के अध्यक्ष डॉ. चंद्रमोहन ने परशीरा ने चंद्राभागा संगम के पौराणिक महत्व का जिक्र किया। केंद्रीय मंत्री
का कार्यक्रम रद्द होने के बावजूद हजारों लोग तांदी संगम पर्व में शामिल हुए। बौद्ध धर्मगुरु अवतारी लामा कुंगा रिंपोछे, मनाली के विधायक गोविंद ठाकुर, विहिप के प्रांत अध्यक्ष अमन पुरी, प्रांत संगठन मंत्री मनोज कुमार, एचपीयू के कुलपति प्रो. एडीएन वाजपेयी, केंद्रीय विवि के कुलपति कुलदीप अग्निहोत्री आदि मौजूद रहे।
चंद्राभागा में प्रवाहित की जाएं मेरी अस्थियां: वीसी
एचपीयू के कुलपति एडीएन वाजपेयी ने कहा कि उनकी इच्छा है कि मृत्यु के बाद उनकी अस्थियों को चंद्राभागा संगम में प्रवाहित किया जाए। कहा कि उनकी तीन बेटियां हैं। संगम पर्व आयोजन समिति के अध्यक्ष एवं प्रोफेसर डॉ. चंद्रमोहन परशीरा उनके पुत्र समान हैं। लिहाजा, उनकी अस्थियों को परशीरा चंद्राभागा में प्रवाहित करें।
चंद्रा और भागा के संगम स्थल पर त्यागा था द्रोपदी ने शरीर
चंद्रा और भागा नदियों का संगम स्थल।
लाहौल में संगम महापर्व के माध्यम से चंद्राभागा नदी के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व को नई पहचान मिलने की उम्मीद है। लाहौल से होकर बहने वाली चंद्राभागा (चिनाब) का पौराणिक महत्व है। लाहौल घाटी के तांदी में चंद्रा और भागा दो नदियां मिलती हैं। यही चंद्राभागा नदी आगे चिनाब का रूप ले लेती हैं।
शिव पुराण में इस ऐतिहासिक नदी में द्रोपदी की अस्थियों को प्रवाहित करने का जिक्र मिलता है। हिंदू और बौद्ध समुदाय के लोग सदियों से तांदी संगम में अस्थियों को विसर्जित करते आ रहे हैं। यहां विशेष छा- छा पूजा विधि से अस्थि विसर्जन किया जाता है। इसी
पौराणिक महत्व के चलते विहिप परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष रहे अशोक सिंघल की अस्थियों का विसर्जन किया गया। ऐतिहासिक और धार्मिक ग्रंथों का हवाला देते हुए एचपीयू में प्रोफेसर डॉ. चंद्र मोहन परशीरा कहते हैं कि इसी नदी के किनारे सोहनी-माहीवाल की अमर प्रेम गाथा का उदय हुआ। रांझा की नाव भी इसी नदी में उतरी थी।
डॉ. परशीरा का दावा है कि द्रोपदी ने तांदी संगम में अपने तन को त्यागा था। शिव पुराण के पांचवें अध्याय में चंद्राभागा नदी के किनारे देवी संध्या के तप करने का वृत्तांत है। यह इस स्थान की पवित्रता और पौराणिक महत्व को उजागर करता है। वेदों में चंद्र खणी से लेकर डिलबु-री तक सारा पर्वत शृंखला चंद्रभागा पर्वत माना गया है।
उनके मुताबिक जिस नदी को वैदिक काल में अस्किनी नाम दिया गया है। उसी नदी को पुराणों में चंद्राभागा कहा गया है। मुगलों और अरबी विद्वानों ने इस नदी के उद्गम स्थल के बारे जब पूछा तो लाहौलियों ने जिस तरफ इशारा किया, वह चीन की दिशा होने से इसे आब-ए-चीन कहा गया, जो बाद में सरल होता हुआ चिनाब बन गया
खोई विरासत को सामने लाने का प्रयास
विभाजन के बाद चंद्रा-भागा नदी (चिनाब) का एक बड़ा भाग पाकिस्तान में बहने लगा। उनके अनुसार इकबाल, फैज अहमद फैज और शिवकुमार बटालवी जैसे नामचीन शायरों ने इसी नदी के किनारे अदब की दुनिया में कदम रखा और नई इबारत लिख डाली। अब महासंगम पर्व के माध्यम से इस पौराणिक नदी की खोई विरासत को फिर दुनिया के सामने लाने का प्रयास होगा।