एक दिलचस्प कहानी है। एक नेताजी चुनाव हार गए। राजनेता थे और कुछ जानते भी नहीं थे। पढ़े-लिखे भी नहीं थे। यानी अंगूठा छाप। जिंदगी भर राजनीति की, जिसमें पढ़ने-लिखने का ज्यादा मतलब नहीं होता। हमारे देश में तो राजनेता होने के लिए अंगूठा छाप होना एक योग्यता है। लोग कहते हैं जमीन से जुड़ा आदमी है। इसे वोट दो। सब तरह से अयोग्य होना ही नेता की योग्यता है। चुनाव क्या हार गए। बड़ी मुश्किल में पड़ गए। कोई नौकरी तो मिल नहीं सकती थी, कहीं चपरासी की भी नौकरी नहीं मिल सकती थी। चेले चपाटे साथ छोड़ चुके थे।
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नेता की किस्मत गांव में एक सर्कस आया। सो उन्होंने सर्कस के मैनेजर से कहा कि भइया, कोई काम पर लगा दो। अरे घोड़े को नहलाता रहूंगा। गधे को नहलाता रहूंगा, यूं भी जिंदगी घोड़ों और गधों के बीच ही बीती है। कोई भी काम कर सकता हूं। प्रमाण के लिए इतना काफी है कि दस साल तक संसद का सदस्य रहा हूं। अब इससे बुरा और क्या काम होगा। तुम जो कहो करूंगा। गोबर, लीद, जो भी कहो सब सफाई कर दूँगा। मैनेजर ने कहा कि भई, गोबर-लीद वगैरह की सफाई करने वाले आदमी तो हैं।
एक काम है अगर कर सको तो, लेकिन अंदर से मैनेजर डर भी रहा था कि भला संसद सदस्य कहीं नाराज न हो जाए। नेता बोले बताइए क्या काम है? सर्कस का मैनेजर थोड़ा झिझका, फिर उसने कहा हमारा असली शेर मर गया है। उसकी खाल हमने निकाल कर रख ली है। उसके भीतर आप घुस जाओ। बस आप टहलते रहना। चारों तरफ खींखचे लगे है। आप बस टहलते रहना। और ये टेप रिकार्डर साथ रखो। बीच-बीच में दहाड़ लगा देना। बस टेप रिकार्डर का बटन दबा देना है। दहाड़ निकल जाएगी। जनता आनंदित हो जाएगी। बस आपका कुल इतना काम है।
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राजनेता ने कहा, इसमें क्या दिक्कत है। अरे यही तो जीवन भर हम करते रहे हैं। तरह-तरह की खालें ओढ़ी, क्या-क्या नाटक नहीं किए। कैसी-कैसी नौटंकी नहीं रची। और हम क्या बोलते थे। अरे टेप रिकार्डर बोलता था। सेक्रेटरी तैयार करता था। हम भाषण के नाम पर होंठ हिला देते थे। नेता बड़े खुश हुए। घुस गए शेर की खाल में। मजा आ रहा था। बार-बार बटन दबाएं और शेर की गर्जना करें। बच्चे एकदम से रोने लगें, स्त्रियां बेहोश हो गईं, पुरुषों का भी सीना दहल रहा था।
सांसदों के वेतन से भी ज्यादा हो गया हिमाचल के विधायकों का वेतन
सांसदों को भत्ते आदि मिलाकर एक लाख 20 हजार रुपये मासिक वेतन मिलता है।
लेकिन उन्होंने तभी देखा कि कठघरे का दरवाजा खुला और एक दूसरा शेर भीतर घुस आया। उसको देखते ही नेताजी चौकड़ी भूल गए। एक दम दो पैर पर खड़े हो गए। लगे चिल्लाने—अरे बचाओ, मार डाला, अरे बचाओ, मारे गए। बचाओ, मुझे यह काम नहीं करना, कोई मुझे बाहर निकालो। वे अब दो पैर पर दौड़ने लगे। यह देख उस दूसरे शेर ने उसके पास जाकर जोर से डांटा- चुप हो जा बदतमीज, क्यों अपने और मेरे पेट पर लाट मार रहा है।
अब यहां जनता भी बैठी है अगर उन्होंने हमें देख लिया तो वो धुनाई होगी की राम नाम सत्य हो जाएगा। और तू क्या सोचता है तू ही चुनाव हारा है, हम भी तो चुनाव हारे हैं। खैर ये मजाक की बात हो गई। नेताओं की सैलरी बढ़ी तो ये कहानी याद आ गई। हमारे सूबे के राजनेता ऐसे नहीं हैं। सब योग्य हैं। पढ़े-लिखे और ऊर्जावान हैं। कई बार पार्टी लाइन से अलग हटकर सिर्फ देश हित में भारत माता की जय के नारे लगाते हैं।
सदन में सत्ता दल के अपने साथियों को संसदीय ज्ञान सिखाते हैं कि किस विधेयक पर हां बोलना हैं और किस पर ना। हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ जाकर अपने लिए पार्किंग बनाना हो तो एकजुट होकर नया विधेयक ले आते हैं। यहां तक तो सब ठीक है। क्योंकि ये जनप्रतिनिधियों का विशेषाधिकार है। लेकिन बिना चर्चा बिना बहस के सिर्फ दस मिनट में अपने वेतन और भत्तों को बढ़ाने का विधेयक पास कराके जनप्रतिनिधि नए विवाद में घिर गए हैं।
एक विधायक जो वेतन के रूप में अब तक एक लाख 32 हजार रु. लेते थे अब वे करीब दो लाख 10 हजार रुपये हर महीने पाएंगे। करीब डेढ़ लाख रु. मासिक वेतन पाने वाले सूबे के मंत्री अब 2.35 लाख मासिक वेतन पाएंगे। जबकि इस देश में सांसदों को ही भत्ते आदि मिलाकर एक लाख 20 हजार रुपये मासिक वेतन मिलता है।
विधायकों को लाखों और एसएमसी शिक्षक को सिर्फ 4500 रुपये वेतन
शिक्षक
- फोटो : demo
इसी तरह पिछले दिनों दिल्ली के जनप्रतिनिधि मालामाल हो गए। तमाम विवाद के बावजूद विधायकों का वेतन 12000 से बढ़कर 50000 रुपये कर दिया गया। विधानसभा सत्र के दौरान उनको 1000 के बजाय 2000 रुपये रोज़ भत्ता मिलेगा। हर साल 5000 रुपये वेतन बढ़ेगा। अभी जहां 88000 रुपये महीने मिल रहे थे बढ़ने के बाद दो लाख 35 हज़ार हो गया।
अभी हाल ही में छत्तीसगढ़ में एक विधेयक पारित हुआ जिसके बाद राज्य के मुख्यमंत्री का वेतन 93 हजार रुपये प्रतिमाह से बढ़कर 1.35 लाख रुपये प्रतिमाह हो गया है। मंत्रियों का वेतन 90 हजार रुपये प्रतिमाह से बढ़कर 1.30 लाख रुपये प्रतिमाह हो गया है। अब विधायकों को 1.10 लाख रुपये प्रतिमाह वेतन मिलेगा।
अब ऐसे में देश और प्रदेश के लोगों का गुस्सा होना जायज है। खासकर हिमाचल जैसे राज्य के लोगों में जहां सूबा गले तक कर्ज में डूबा है। हिमाचल पर 35,151 करोड़ का कर्ज है। इस वित्तीय वर्ष में हमें 3,400 करोड़ रु. सिर्फ ब्याज देना है। हम केंद्र की बैसाखी के मोहताज हैं। आजादी के 69 सालों में यह राज्य गरीबी के कारण अपनी राजधानी के लिए पीने के साफ पानी का इंतजाम नहीं कर पाया। पीलिया से इस साल कई जानें गईं। पूरे राज्य में एम्स और चंडीगढ़ पीजीआई जैसा बड़ा सुपर स्पेशलिस्ट अस्पताल नहीं।
सुदूर बसे गांवों तक संपर्क मार्ग नहीं। रिटायरमेंट के बाद जीने का अकेला सहारा पेंशन का होता है, तो कर्मचारी का हक है। राज्य के कई विभागों के पास पैसा नहीं कि वे अपने सेवानिवृत्त कर्मियों को पेंशन दे सकें। जिन्हें पेंशन मिलती है वह इतनी कम है कि गुजारा करना मुश्किल है। सरकार ने वादा किया था कि पेंशन बढ़ाएंगे। लेकिन अंत में वही मजबूरी कि हमारे पास पैसा नहीं।
ग्राम रोजगार सेवक को प्रतिमाह सिर्फ 5000 रु. मानदेय मिलता है।
आप कह सकते हैं जनप्रतिनिधि भी इंसान हैं। उन्हें भी अपना घर बार चलाना होता है। उनकी सैलरी बढ़े इस पर भला किसे एतराज हो सकता है। लेकिन आप दूसरी तरफ भी देखिए। इस राज्य में एसएमसी शिक्षक को 4500 रु. महीने का मेहनताना मिलता है। इन्हें सुदूर गांवों में तैनात किया जाता है। कई स्कूलों में यहां आठ-आठ महीने से इन शिक्षकों को तनख्वाह नहीं मिली। मनरेगा को क्रियान्वित करने वाले ग्राम रोजगार सेवक को प्रतिमाह करीब 5000 रु. मानदेय मिलता है।
इस तरह के दर्जनों श्रेणियां हैं कर्मचारियों की, जिन्हें महीनों से वेतन नहीं मिला। कभी आपने सोचा इनका गुजारा कैसे चलता होगा? तो अगर ऐसे सामाजिक कल्याण की योजनाओं में कटौती करके आप खुद अपनी सैलरी बढ़ाते हैं तो पब्लिक का गुस्सा आना जायज है। खासतौर से तब जब इस देश में यह मान्यता रही है कि राजनीति समाजसेवा है और उसके लिए नि:स्वार्थ भाव जरूरी है। फिर किसी छोटी कंपनी में भी कर्मचारी की सैलरी उसका काम देखकर बढ़ाने का प्रावधान है।
परफारमेंस का अगर हम आकलन करें तो कैग की ताजा रिपोर्ट उसका खुलासा करती है। कई विभागों में सालाना बजट का करीब 63 फीसदी हिस्सा वित्तीय वर्ष के अंतिम महीने में आंख बंद कर खर्च कर दिया गया। ऐसे में आप विकास की क्या उम्मीद करेंगे? मजे की बात है कि संसद या विधानसभा के काम काज को बिजनेस के नाम संबोधित किया जाता है।
इसे जनप्रतिनिधियों का काम माना जाता है। अकेले बजट सत्र में कोई 12 विधेयक पेश हुए जिनमें किसी पर भी लंबी चर्चा नहीं हुई। सब हंगामे के बीच पारित हो गए। जनता के आधे से ज्यादा सवालों का नंबर नहीं आया। अनावश्यक मुद्दों पर हुए हंगामे में जनता की समस्याओं से जुड़े मुद्दे हाशिए पर रहे।
तो सवाल यहां अधिकार का नहीं कर्तव्य और नैतिकता का है। अपनी सैलरी बढ़ाना बेशक आपका अधिकार क्षेत्र है लेकिन उस जिम्मेदारी को भी समझिए जो जनता ने आपके कंधे पर डाली है। आप लोकतंत्र के खुल्द (स्वर्ग) में हैं। जनता बड़ी बेदर्दी से यहां से बाहर निकालती है। इसे समझिए। गालिब समझ गए थे। इसीलिए लिख गए-‘निकलना खुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले’।