उपचुनाव से पहले गुजरात, कर्नाटक , उत्तराखंड आदि राज्यों में जब मुख्यमंत्रियों को बदला गया तो उस वक्त हिमाचल के बारे में भी इस चर्चा ने जोर पकड़ा कि यहां भी कुछ ऐसा हो सकता है। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के विरोधी भी इस चर्चा को तूल देते रहे।
हिमाचल प्रदेश में हुए उपचुनाव में भाजपा को मिली करारी हार के बाद अब सरकार और संगठन के चेहरों का जमा रहना बड़ी चुनौती होगा। जिस तरह से उपचुनाव के नतीजे आए हैं। यह न तो सरकार और न ही संगठन की सेहत के लिए अच्छे हैं। उपचुनाव से पहले गुजरात, कर्नाटक , उत्तराखंड आदि राज्यों में जब मुख्यमंत्रियों को बदला गया तो उस वक्त हिमाचल के बारे में भी इस चर्चा ने जोर पकड़ा कि यहां भी कुछ ऐसा हो सकता है। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के विरोधी भी इस चर्चा को तूल देते रहे।
विज्ञापन
सीएम जयराम ठाकुर के दिल्ली दौरे को भी इससे जोड़ते रहे। हालांकि मुख्यमंत्री पूरे दमखम से इस बारे में सफाई देते रहे। मौजूदा परिस्थितियों में उनके विरोधियों को ऐसी तमाम बातें बनाने का फिर मौका मिल जाएगा। इसके अलावा जयराम कैबिनेट के मंत्रियों की परफॉर्मेंस पर भी कई बार सवाल उठते रहे हैं। मंत्रिमंडल में फेरबदल की संभावना भी जताई जाती रही है। ऐसे में इस संभावना को भी बल मिल सकता है।
अर्की विधानसभा का टिकट रतनपाल सिंह को दिलाने और यहां से गोविंद राम शर्मा का टिकट फिर काटे जाने में संगठन के एक बड़े प्रादेशिक नेता का हाथ माना जाता रहा है। इससे इन नेता की प्रतिष्ठा को भी आंच पहुंच सकती है। भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सुरेश कश्यप, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के करीबी माने जाने वाले भाजपा के प्रदेश प्रभारी अविनाश राय खन्ना और सह प्रभारी संजय टंडन से भी केंद्रीय नेतृत्व को पूछ सकता कि भाजपा अपनी रणनीति में कहां चूक गई। बहरहाल, अगले चुनावी वर्ष को लक्षित कर भाजपा सरकार और संगठन के कई चेहरे बने रहेंगे या नहीं, इस पर भी चर्चा छिड़ गई है।