आजादी के समय से लेकर आज तक करीब 2500 से अधिक पहाड़ी गीत लिखकर इतिहास बना चुके 75 वर्षीय लायक राम रफीक का शुक्रवार सुबह निधन हो गया। वह लंबे समय से बीमार चल रहे थे। रविवार सुबह उन्होंने ठियोग के नंगलदेवी गांव स्थित अपने घर में अंतिम सांस ली।
ऐसा कोई गायक नहीं होगा, जिसने पारंपरिक गीतों के पीछे छिपे इतिहास के जन्मदाता लायक राम रफीक के गानों को न गाया हो। वर्ष 1944 में जन्मे रफीक एक जमाने में रेडियो पर अपनी आवाज का जादू बिखेर चुके हैं।
किताबों को पढ़ने और घंटों लाइब्रेरी में समय बिताने की आदत ने लायक राम रफीक को गीतकार बनने के लिए प्रेरित किया। ठियोग के खगादल क्षेत्र के रफीक के आसपास के क्षेत्र के ही दर्जनों गायक प्रदेश को मिले।
इन्होंने अपनी प्रतिभा का जलवा प्रदेश के साथ अन्य राज्यों में भी बिखेरा। फूंकणे दै पौलिये जीउ मेरा औरा टालै रैके रिये मानतौ एहीं आगैये न जाले जैसी नाटियों से समा बांधने वाले रफीक की लेखनी को हमेशा याद किया जाएगा।
लोक गायक किशन वर्मा, कुलदीप शर्मा, सुरेश शर्मा, प्रदीप शर्मा, महेंद्र राठौर, गीतकार हरि सिंह वर्मा, देवरीघाट पंचायत प्रधान सुरेश वर्मा, उपप्रधान प्रदीप खाची, जिप सदस्य इंदु वर्मा, विधायक राकेश सिंघा ने रफीक के निधन पर गहरा शोक प्रकट किया है।