स्कूलों को हर्बल गार्डन के लिए 500 वर्ग मीटर भूमि निर्धारित करनी होगी। प्रत्येक गार्डन में स्थानीय कृषि-जलवायु क्षेत्र के आधार पर दुर्लभ, लुप्तप्राय: और संकटग्रस्त प्रजातियों सहित औषधीय पौधों की 10-15 प्रजातियां लगाई जाएंगी। छात्र औषधीय पौधों को रोपने, पानी देने और लेबल लगाने में सक्रिय रूप से भाग लेंगे। इससे उन्हें उन प्रजातियों के स्वास्थ्य लाभों के बारे में व्यावहारिक अनुभव और ज्ञान प्राप्त होगा। पर्यावरण के अनुकूल प्रथाओं को बढ़ावा देते हुए पौधों की वृद्धि को बढ़ाने के लिए वर्मी-कम्पोस्ट और जैविक उर्वरकों के उपयोग को प्रोत्साहित किया जाएगा। इस पहल में पौधों की लेबलिंग की व्यवस्था है जहां छात्र पाैधे की प्रजाति जान पाएंगे।
किस जिले के कितने स्कूलों मंे होगा निर्माण
कांगड़ा जिले में सबसे अधिक 21, मंडी-शिमला में 8-8, कुल्लू-सोलन में 6-6, बिलासपुर-ऊना-सोलन में 5-5, चंबा-हमीरपुर में 4-4, किन्नौर में 2 और लाहौल-स्पीति जिला के एक स्कूल में हर्बल गार्डन बनाया जाएगा। स्कूलों को अभिभावक-शिक्षक संघों (पीटीए) और गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) के सहयोग से छुट्टियों के दौरान भी बगीचों के साल भर रखरखाव को सुनिश्चित करने का काम सौंपा है।
पारंपरिक चिकित्सा और पर्यावरण जागरूकता को बढ़ावा देने की दिशा में यह कदम उठाया गया है। इसका उद्देश्य छात्रों को प्रकृति की उपचार शक्ति से जोड़ने और उन्हें पारंपरिक औषधीय ज्ञान देना है। वे प्रकृति को भी जान पाएंगे।-डॉ. अमरजीत कुमार शर्मा, उच्च शिक्षा निदेशक