कुछ मांगें जैसे वेतन को 25 हजार रुपये मासिक करने और पूर्व में निष्कासित किए 27 कर्मियों को वापस सेवा पर लेना भी संभव नहीं है। कुछ कर्मचारियों को शराब पीने, डीजल चोरी करने जैसे आरोपों पर निकाला गया है।
सुकुमारन ने कहा कि 63 कर्मचारियों की सेवाएं बर्खास्त करने से पहले उन्हें चेता दिया गया था। हड़ताली कर्मचारियों को तीन बार नोटिस दिए गए। एंबुलेंस चलाने के लिए उत्तराखंड के बाद राजस्थान और गुजरात से भी ड्राइवर बुलाए गए हैं
ताकि खड़ी एंबुलेंस को सड़कों पर चलाया जा सके। बाहरी राज्यों से ऐसे करीब 100 चालक बुलाए गए हैं। इनके अलावा होमगार्ड और सरकारी चालक भी एंबुलेंस चला रहे हैं।
108 एंबुलेंस कर्मचारी यूनियन के अध्यक्ष पूर्ण चंद ने प्रदेश सरकार पर तानाशाही रवैया अपनाने का आरोप लगाया है। पूर्ण चंद ने चेतावनी दी है कि जब तक वेतन विसंगति का मसला हल नहीं होता, तब तक संघर्ष जारी रहेगा।
प्रदेश में एंबुलेंस कर्मियों की हड़ताल को लेकर कांग्रेस ने जयराम सरकार को कठघरे में खड़ा किया है। प्रदेश कांग्रेस कमेटी मीडिया विभाग के चेयरमैन नरेश चौहान ने कहा कि जयराम सरकार तुरंत 102 व 108 एंबुलेंस कर्मचारियों की जायज मांगें मानकर हड़ताल को खत्म कराए।
उन्होंने हड़ताल के लिए सीधे तौर पर सरकार को ही जिम्मेदार ठहराया। चौहान के अनुसार सरकार इस मामले में भी प्रशासनिक तौर पर पूरी तरह विफल रही है।
स्वास्थ्य मंत्री को अड़ियल रवैया अपनाने के बजाय तुरंत हड़ताली कर्मियों को वार्ता का न्यौता भेजना चाहिए ताकि हड़ताल को खत्म कराया जा सके। चूंकि, हड़ताल के कारण एंबुलेंस सेवाएं ग्रामीण क्षेत्रों में पूरी तरह पटरी से उतर चुकी हैं।
लोगों को एंबुलेंस न मिलने पर आपात समय में भारी भरकम राशि खर्च कर निजी वाहनों का सहारा लेना पड़ रहा है। सरकार वार्ता के बजाय हड़ताली कर्मियों पर एस्मा लगाकर दमनात्मक कार्रवाई कर रही है। लोकतंत्र में यह उचित नहीं है।
सरकार ने अगर गंभीरता से कोशिश की होती तो यह हालात उत्पन्न न होते। चौहान ने कहा कि सरकार उनकी मांगों को बिना देरी के पूरा करे ताकि ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को राहत मिल सके। चौहान ने कहा कि पूर्व कांग्रेस सरकार के समय एंबुलेंस कर्मियों की हड़ताल इतनी लंबी कभी नहीं हुई, न ही उन पर दमनात्मक कार्रवाई की गई।