निजी स्कूलों से सत्र 2018-19 और 2019-20 के तलब किए फीस स्ट्रक्चर का ब्योरा देने में स्कूल प्रबंधन आनाकानी कर रहे हैं। हैरत इस बात की है कि अभी तक सरकार और शिक्षा विभाग इन स्कूलों के खिलाफ कोई सख्त नहीं उठा पाया है। जिला शिमला और राजधानी के 160 में से 65 स्कूलों ने ही फीस का ब्योरा दिया है। इसमें भी स्कूलों ने रजिस्ट्रेशन फीस न लेकर ट्यूशन फीस और वार्षिक शुल्क में सब शामिल करके दिखा रखा है। वार्षिक शुल्क इकट्ठा दिखा दिया है, जबकि उसका मदों के आधार पर विवरण देना जरूरी है।
राजधानी के अधिकतर सीबीएसई, आईसीएसई और आईएससी से संबद्ध स्कूलों ने जो ब्यौरा दिया है उन्होंने फीस में 10 से 15 फीसदी की बढ़ोतरी कर फीस वसूलने के फरमान भी जारी कर दिए हैं। फीस स्ट्रक्चर के तुलनात्मक अध्ययन में यह खुलासा हुआ है। यही नहीं बढ़ाई गई फीस के स्ट्रक्चर को छुपाने के लिए एनुअल चार्जेज और ट्यूशन फीस में एकमुश्त हजारों की बढ़ोतरी कर दी है। अब तक आए फीस स्ट्रक्चर में की गई बढ़ोतरी से साफ है कि बड़े निजी स्कूल हर साल अभिभावकों पर हजारों की फीस का अतिरिक्त बोझ डाल रहे हैं। वहीं छोटे और एचपी बोर्ड से संबद्ध स्कूलों में भी फीस बढ़ाई है, मगर यह अधिकतम एक हजार तक बढ़ाई गई है।
एनओसी तक हो सकता है रद्द : बत्ता
उपनिदेशक उच्च शिक्षा जिला शिमला राजेश्वरी बत्ता ने कहा कि निदेशालय से आए ताजा आदेशों में साफ किया है कि जो निजी स्कूल दो सालों का फीस ब्योरा तय फार्मेट में नहीं दे रहे हैं उनके खिलाफ शिकायत आने पर अधिनियम 1997, नियम 2003 और आरटीई एक्ट के तहत कार्रवाई की जाएगी। इसमें स्कूलों के एनओसी तक रद्द किए जा सकते हैं। कहा कि फीस का विस्तृत विवरण सौंपने को लेकर फिर से सभी स्कूलों को ई मेल की जा रही है।
अभिभावक कर सकते हैं उपनिदेशक से शिकायत
उपनिदेशक कार्यालय उच्च और प्रारंभिक शिक्षा के कार्यालय में अधिक फीस वसूली से संबंधित शिकायतें अभिभावक सीधे कर सकते हैं। इसमें उप निदेशक कार्यालय शिकायतकर्ता का नाम गुप्त रख कर संबंधित स्कूल से जवाब मांगेगा। यदि इसमें स्कूल की मनमानी साबित होती है और नियमों और कानूनों की अनदेखी पाई जाती है, तो कार्रवाई अमल में लाई जा सकती है।
छात्र-अभिभावक मंच अब स्कूलों में शुरू करेगा प्रदर्शन
शिमला। छात्र अभिभावक मंच ने धमकी दी है कि यदि मांग के मुताबिक स्कूलों की मनमानी रोकने को ठोस नीति न बनाई तो स्कूल परिसरों में प्रदर्शन शुरू किए जाएंगे। इसके लिए पूरी तरह से प्रदेश सरकार और शिक्षा विभाग जिम्मेदार होगा। मंच के संयोजक विजेंद्र मेहरा ने कहा निजी स्कूल इतने बेलगाम हो गए हैं कि सरकार के फैसले के मुताबिक विभाग द्वारा भेजे नोटिस के बावजूद जवाब नहीं दे रहे। शिक्षा विभाग को बार-बार समय सीमा बढ़ानी पड़ रही है। स्कूलों की मनमानी से जाहिर है कि उन्हें सरकार और विभाग का कोई भय नहीं, उन्हें सरकार ने लूट की खुली छूट दे रखी है। स्कूल हाई कोर्ट के आदेशों तक को नहीं मान रहे हैं। न्यायालय ने सभी निजी स्कूलों को स्कूलों को सब्सिडाइज्ड रेट पर स्कूल बस सुविधा देना अनिवार्य किया था वहीं छात्रों की सुरक्षा को लेकर भी आदेश दिए थे।
न्यायालय के आदेशों को हो पालन
संयोजक विजेंद्र और सह संयोेजक बिंदु जोशी ने कहा कि राजधानी शिमला में हर साल हजारों की फीस बढ़ोतरी कर अभिभावकों को लूटने का काम कर रहे बड़े स्कूलों ने अपनी बस सुविधा नहीं दे रखी है। यहां एचआरटीसी बस सुविधा मुहैया करवा रहा है। इसमें छात्रों से पूरा किराया वसूला जाता है। इनमें बच्चों को सीट तक नहीं मिलती है। बैठने की क्षमता से अधिक बच्चे इनमें सफर करने को मजबूर हैं। यह संविधान की धारा 39 ए का उल्लंघन है। वर्ष 2016 में हिमाचल हाई कोर्ट द्वारा दिए निर्णय के अनुसार न केवल एडमिशन फीस और बिल्डिंग फंड वसूली पर रोक लगे बल्कि प्राइवेट स्कूल अपनी बसें चलाकर बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करे।