कहते हैं कि अस्थि विसर्जन न हो तो मरने वाले की आत्मा को शांति नहीं मिलती, लेकिन हिमाचल में ऐसे हजारों मृतक हैं जिनके शरीर के अंश अब तक केमिकल में लिपटे थानों के मालखानों में निस्तारण का इंतजार कर रहे हैं। संदेहास्पद स्थितियों में मरे इन लोगों के विसरे को यूं तो शरीर से निकालकर टेस्ट के लिए फोरेंसिक लैब भेजा गया था। लैब में जांच और रिपोर्ट के बाद भी यह अब तक थानों में रखे हुए हैं।
यह तब है, जब बायोमेडिकल वेस्ट एक्ट किसी भी व्यक्ति के शरीर के अंग के विधिवत निस्तारण की बात कहता है। दरअसल, किसी भी हादसे या अन्य वजह से हुई मौत के कारण का वैज्ञानिक पता लगाने को पोस्टमार्टम कराया जाता है। पोस्टमार्टम में अगर मृत्यु का सही कारण स्पष्ट न हो तो उसका विसरा सुरक्षित किया जाता है।
इसलिए रखे जाते हैं विसरा सैंपल
विसरा सैंपल को केमिकल में संरक्षित रखा जाता है। विसरा सैंपल की जांच फोरेंसिक साइंस लेबोरेट्री (एफएसएल) जुन्गा में की जाती है। वर्तमान प्रक्रिया में जांच पूरी होने के बाद लैब विसरा थानों को रिपोर्ट के साथ लौटा देती है। यह प्रक्रिया इसलिए की जाती है कि अगर कोई व्यक्ति जांच रिपोर्ट से संतुष्ट न हो तो वह कहीं और भी विसरा की जांच करा सकता है।
जांच कराने को तो अब तक किसी ने रिपोर्ट को चैलेंज नहीं किया, लेकिन इस प्रक्रिया की वजह से सूबे के थानों के मालखानों में हजारों विसरा इकट्ठा हो चुके हैं। खास बात यह है कि प्रदेश में अब तक विसरा डिस्पोजल के लिए कोई प्रावधान ही नहीं है। इसकी वजह से पुलिस न खुद विसरा को निस्तारित कर पा रही है और न ही मरने वालों के परिचित या रिश्तेदार उसे वापस ले रहे हैं।
एक वजह यह भी
कानूनी जानकारों के मुताबिक अगर मौत संदिग्ध परिस्थिति में हो और अंदेशा हो कि जहर से मौत हुई है तो विसरा की जांच की जाती है। इसमें रासायनिक परीक्षण के लिए मृतक के लिवर, किडनी, आंतें सहित अन्य अंग लिए जाते हैं। विसरा प्रिजर्व करने के दौरान डेड बॉडी से लीवर, स्प्लीन और किडनी का पार्ट रखा जाता है।
साथ ही शरीर में मौजूद फ्लूड आदि को प्रिजर्व किया जाता है। जब भी संदिग्ध परिस्थिति में मौत हो तो पोस्टमार्टम रिपोर्ट के साथ-साथ कई बार विसरा की जांच की जाती है। विसरा रिपोर्ट आने के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि मौत जहर से हुई है या नहीं। सीआरपीसी की धारा 293 के तहत एक्सपर्ट व्यू एडमिसिबल एविडेंस होता है यानी विसरा रिपोर्ट एक्सपर्ट व्यू होती है और यह मान्य साक्ष्य है।