गिरिपार क्षेत्र के साथ-साथ पड़ोसी राज्य उतराखंड के जौनसार बाबर में भी माघी पर्व मनाने की परंपरा है। पर्व पर गिरिपार क्षेत्र का हर व्यक्ति अपने घर में मौजूद रहता है। जो लोग गिरिपार क्षेत्र से बाहर नौकरी कर रहे हैं, वह भी इस दिन घर लौटते हैं। 11 जनवरी को सभी घरों में पहाड़ी व्यंजन उलौले, तेलपक्की, बडोली बनाई जाती है। जबकि अगले दिन 12 जनवरी से बकरों के काटने का सिलसिला शुरू हो जाएगा।
महाकाली की होती है विशेष पूजा
हाटी समिति के उपाध्यक्ष सुरेंद्र हिंदुस्तानी ने बताया कि गिरिपार क्षेत्र में यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। लगभग प्रत्येक परिवार में इस पर्व पर बकरे काटे जाएंगे। इस दिन बाकायदा महाकाली की भी विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। उन्होंने कहा कि कुछ लोग बकरे खरीदकर काटते हैं तो कुछ बकरे के बदले में कुछ और सामान देते हैं। जबकि कुछ लोग स्वयं बकरों को माघी के लिए विशेष रूप से पालते हैं।
विवाहिता और मेहमानों को रखा जाता है हिस्सा
माघी पर पर्व बनने वाले पकवान और बकरे के काटे गए मांस का हिस्सा बेटी, बहन आदि को रखा जाता है। जबकि मेहमानों के लिए भी इसी प्रकार से हिस्सा रखा जाता है। हाटी समिति के महामंत्री कुंदन शास्त्री ने बताया कि माघी पर्व पर अपनी बेटी या बहन आदि को गुड़ भेजा जाता है। जबकि उसके लिए मांस अलग से रखा जाता है। जो मायके आने पर उसे परोसने की परंपरा है।