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हिमाचल प्रदेश: आईजीएमसी शिमला के आई बैंक ने बदली 390 दृष्टिबाधितों की जिंदगी, इच्छुक ऐसे भर सकते हैं फार्म

Thu, 11 Jun 2026 10:24 AM IST
Ankesh Dogra अमर उजाला ब्यूरो, शिमला।

सार

शिमला स्थित इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के आई बैंक में वर्ष 2010 से अब तक 460 लोगों ने मृत्यु के बाद नेत्रदान किया है। इनमें से 390 सफल कॉर्निया प्रत्यारोपण किए जा चुके हैं, जिससे सैकड़ों दृष्टिबाधित लोगों को नई रोशनी और बेहतर जीवन मिला है। पढ़ें पूरी खबर...
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आईजीएमसी शिमला। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार
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मृत्यु के बाद भी आपकी आंखें इस संसार को देख सकती हैं। इसके लिए परिजनों की मदद से मृत्यु के बाद किसी भी व्यक्ति का नेत्रदान किया जा सकता है। इससे दृष्टिबाधित लोगों को एक नई जिंदगी मिल सकती है। ऐसा ही कुछ 390 लोगों ने बीते वर्षों में किया है।

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मृत्यु से पहले ही यह लोग नेत्रदान करने की शपथ लेकर गए थे। इनकी जब मृत्यु हुई, तो परिजनों ने स्वयं आईजीएमसी नेत्र बैंक (आई बैंक) में इसकी जानकारी दी। इसके बाद टीम ने घर जाकर कॉर्निया को सुरक्षित रूप से कलेक्ट किया। आईजीएमसी में 390 दृष्टिबाधितों को संसार दिखाने के लिए लोग मृत्यु के बाद अपनी आंखों की रोशनी दे गए।
 

इसके बाद से यह लोग दुनिया देख रहे हैं और अपना कामकाज भी कर रहे हैं।  नेत्र विभाग के अनुसार आईजीएमसी में वर्ष 2010 से अभी तक 460 लोगों ने मृत्यु के बाद नेत्रदान किया है। हालांकि इनमें से 390 लोगों को ही यह नेत्र लग पाए हैं। खराब होने और कुछ अन्य तकनीकी कारणों के चलते कुछ आंखें रिजेक्ट भी हुई हैं।

आईजीएमसी के नेत्ररोग विभागाध्यक्ष डॉ. रामलाल शर्मा ने बताया कि अस्पताल के आई बैंक में जरूरतमंदों को नेत्र लगाने के लिए ट्रांसप्लांट किया जाता है। अब तक 390 सफल ट्रांसप्लांट किए जा चुके हैं। नेत्रदान हमेशा मृत्यु के बाद ही होता है। मृत्यु के करीब छह घंटे के भीतर नेत्रदान किया जा सकता है। एक से लेकर 100 वर्ष तक  का कोई भी व्यक्ति नेत्रदान  करने में सक्षम है। अस्पताल के अलावा नेत्रदान घर पर भी किया जा सकता है, जहां मेडिकल टीम मृत व्यक्ति के शरीर से नेत्र (कॉर्निया) निकालकर सुरक्षित रख लेती है।

नेत्रदान के इच्छुक ऐसे भर सकते हैं फार्म
नेत्रदान के लिए लोग अपने नजदीकी आई बैंक, अस्पताल या विभाग की वेबसाइट के माध्यम से ऑनलाइन या ऑफलाइन संकल्प फार्म भर सकते हैं। पंजीकरण के बाद डोनर को एक डोनर कार्ड दिया जाता है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण कदम यह है कि अपने इस निर्णय के बारे में परिवार को जरूर जानकारी दें, क्योंकि मृत्यु के बाद अंतिम निर्णय और सहमति उन्हीं की होती है। नेत्ररोग विभागाध्यक्ष डॉ. रामलाल शर्मा ने बताया कि अस्पताल के आई बैंक में जरूरतमंदों को नेत्र लगाने के लिए ट्रांसप्लांट किया जाता है। अब तक 390 सफल ट्रांसप्लांट किए जा चुके हैं।
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निधन होने पर यह करें
परिवारजन नेत्रदान के लिए सहमति दे देते हैं, तो शव वाले कमरे के पंखे तुरंत बंद कर दें ताकि आंखें सूखने से बची रहें। मृतक की दोनों आंखें धीरे से बंद कर दें और उनके ऊपर साफ गीली रुई या पट्टी रख दें। तकिये की मदद से मृतक के सिर को धड़ से थोड़ा ऊपर (लगभग 6 इंच) उठाकर रखें।
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