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सरकारी आवासों को किराए पर देकर कमाई कर रहे कर्मचारी

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सरकारी आवासों को किराए पर देकर कर्मचारी लगा रहे चूना
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सबलेटिंग करने वालों में कई वरिष्ठ कर्मचारी भी शामिल
निगम आयुक्त के पास भी पहुंचीं कई शिकायतें
अशोक चौहान
शिमला। शहर में नगर निगम के सरकारी आवासों को किराए पर देकर मोटी कमाई का खेल चल रहा है। सस्ती दरों पर निगम से मिले आवासों को कुछेक कर्मचारी अपने रिश्तेदारों और साथी कर्मचारियों को सबलेट कर पैसा कमा रहे हैं। कई शिकायतें निगम आयुक्त के पास भी पहुंच गई हैं। कर्मचारियों को ये आवास चार सौ रुपये से भी कम मासिक शुल्क पर मिलते हैं जबकि इन्हें दूसरे कर्मचारी को देकर पांच से दस हजार रुपये कमाए जा रहे हैं। अपने आवास दूसरों को देने वालों में वे कर्मी शामिल हैं, जिनके शहर में या तो अपने मकान हैं या फिर ये शहर के बाहर रहते हैं। शहर में नगर निगम के सूजी लाइन, सब्जी मंडी, कोर्टहिल, बालूगंज, ढली, कृष्णानगर समेत कई उपनगरों में सरकारी आवास बने हैं। इनमें तीन सौ से अधिक कर्मचारियों को ठहराने की सुविधा है लेकिन कई कर्मचारी ऐसे हैं जिन्होंने निगम से आवास तो ले लिए लेकिन खुद इनमें नहीं रहते।
सूत्रों के मुताबिक सड़क और भवन शाखा के एक कारपेंटर ने सूजी लाइन स्थित अपना आवास इसी विभाग के एक सुपरवाइजर को दे रखा है। वहीं, टैक्स शाखा में तैनात एक वरिष्ठ कर्मचारी ने भी मेफील्ड स्थित अपने आवास में एमसी के ही एक अन्य कर्मचारी को ठहरा रखा है। अकाउंट ब्रांच में तैनात कर्मचारी का कैथू में मकान है। बालूगंज में सफाई कर्मचारी के मकान में किसी बाहरी व्यक्ति को ठहराया गया है। इसी तरह स्वास्थ्य शाखा के भी कई कर्मचारी खुद तो ढारों में रह रहे हैं, लेकिन अपने आवास किराए पर दे रखे हैं। करीब आधा दर्जन लोग ऐसे हैं जो डेढ़ से दो साल पहले रिटायर हो गए, लेकिन आवास अब तक नहीं छोडे़ हैं।
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औचक निरीक्षण में पकड़े आधा दर्जन कर्मचारी
साल 2010 में मिली शिकायतों के बाद निगम ने सरकारी आवासों का औचक निरीक्षण किया था। इस दौरान करीब आधा दर्जन कर्मचारी ऐसे मिले थे जो दूसरे कर्मचारियों को मिले आवासों में रह रहे थे। निगम ने रातोंरात ये आवास खाली करवा दिए थे।

106 में सिंगल, 388 रुपये में डबल रूम सेट
सरकारी आवास के बदले कर्मचारियों से हर माह लाइसेंस फीस ली जाती है। निगम तीन श्रेणियों में अपने कर्मचारियों को आवासीय सुविधा दे रहा है। टाइप वन में सिंगल रूम आते हैं, जिनकी मासिक लाइसेंस फीस 106 रुपये बनती है। ये आवास ज्यादातर मजदूर और निचले श्रेणी के कर्मचारियों के लिए हैं। टाइप टू में दो रूम सेट हैं, जिनकी मासिक लाइसेंस फीस 228 रुपये है। टाइप तीन में 388 मासिक लाइसेंस फीस में दो रूम की सुविधा दी जाती है। हालांकि, जिन्हें ये आवास मुहैया करवाए जाते हैं, उन्हें आवासीय भत्ता नहीं दिया जाता।
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शिकायतें आई हैं, जांच चल रही है
ऐसी शिकायतें मिली हैं जिनकी जांच की जा रही है। जांच में दोषी पाए जाने वालों के आवास रद्द होंगे। इनसे कई गुना शुल्क भी वसूला जाएगा। रिटायर होने के बावजूद जिन्होंने आवास नहीं छोड़े हैं, उन्हें भी 31 मार्च तक का समय दिया है। -पंकज राय, नगर निगम आयुक्त
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