लाहौल घाटी औषधीय वनस्पतियों और पारंपरिक उपचार संबंधी ज्ञान का महत्वपूर्ण भंडार है। यहां किए गए एक प्रारंभिक सर्वेक्षण में 16 वनस्पति परिवारों की 25 औषधीय प्रजातियों का दस्तावेजीकरण किया गया है। शोधकर्ताओं ने स्थानीय बुजुर्गों, चरवाहों और पारंपरिक वनस्पति ज्ञान रखने वाले लोगों से बातचीत कर पौधों के स्थानीय नाम, उपयोग और औषधीय महत्व से जुड़ी जानकारियां जुटाई हैं। इनके प्राकृतिक आवास और औषधीय गुणों से संबंधित उपलब्ध वैज्ञानिक शोधों की भी समीक्षा की गई है।
यह सर्वेक्षण दो नवंबर को आयुषधारा शोध पत्रिका में छपा है। यह अध्ययन पपरोला स्थित राजीव गांधी राजकीय स्नातकोत्तर आयुर्वेदिक महाविद्यालय एवं अस्पताल के द्रव्यगुण विभाग की शोधार्थी सुकृति और मोनिका मेहता ने प्रोफेसर रश्मि श्रीवास्तव के मार्गदर्शन में किया है। शोधकर्ताओं ने मई 2026 में लाहौल घाटी के चयनित गांवों में क्षेत्रीय सर्वेक्षण किया। इस दौरान स्थानीय लोगों से बातचीत कर वनस्पतियों के स्थानीय और वैज्ञानिक नाम, वनस्पति परिवार, उपयोग में लाए जाने वाले हिस्सों और पारंपरिक औषधीय उपयोगों की जानकारी ली।
पौधों की तस्वीरें लेने के साथ उनके प्राकृतिक आवास और भौगोलिक स्थिति का भी रिकॉर्ड तैयार किया गया। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, कुठ की जड़ का उपयोग पेट दर्द, खांसी और जुकाम में किया जाता है। मनु की जड़ खांसी और सांस संबंधी परेशानियों, जबकि छोरा की जड़ पाचन संबंधी समस्याओं में इस्तेमाल होती है। कई वनस्पतियां स्थानीय खानपान का भी हिस्सा हैं। अरचा के तने और पत्तियों का उपयोग भोजन में, चरमा के पके फलों का रस गर्म पेय के रूप में और चुकरी की पत्तियों का साग बनाने में किया जाता है। शोधकर्ताओं ने वनस्पतियों में मौजूद प्रमुख रासायनिक तत्वों और उन पर प्रकाशित वैज्ञानिक अध्ययनों की भी समीक्षा की है। आयुर्वेदिक ग्रंथों में उल्लेख के आधार पर इन्हें उक्त, अनुक्त और ईषदुक्त श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है।
सर्वेक्षण में दर्ज प्रमुख वनस्पतियां : कुठ, मनु, छोरा, कस्मल, चरमा, अरचा, चुकरी, बुच्छुर, पेथरा, शुर, शुकपा, बुज, नुरचा, विलो, बजारबंग, धनद्रो, लेमबुट, करकू, काडू, उम्बालिकुरी, बांककड़ी, पिंडियाली, पिपड़ी त्सरंग, माशा, सुरजी लैब, हड़जोड़, चुआंग, चाबू और कल्याश सहित स्थानीय नामों वाली वनस्पतियों को शोधपत्र में दर्ज किया गया है।
पीढ़ियों से चले आ रहे ज्ञान को सहेजने पर जोर : शोधकर्ताओं के अनुसार औषधीय वनस्पतियों के उपयोग से जुड़ा पारंपरिक ज्ञान स्थानीय समुदायों में पीढ़ियों से मौखिक रूप से आगे बढ़ता रहा है। समय के साथ इसके लुप्त होने की आशंका है। इसका व्यवस्थित दस्तावेजीकरण जरूरी है। उन्होंने घाटी में व्यापक सर्वेक्षण और वनस्पतियों के रासायनिक एवं औषधीय गुणों की विस्तृत वैज्ञानिक जांच की आवश्यकता जताई है। साथ ही स्पष्ट किया है कि पारंपरिक उपयोग या किसी रासायनिक तत्व की मौजूदगी मात्र से पौधे की उपचार क्षमता और सुरक्षा प्रमाणित नहीं होती।