शिमला। देशभर में 'वाटरमैन' के नाम से चर्चित राजस्थान के राजेंद्र सिंह ने शिमला शहर में पेयजल संकट खत्म करने को लेकर अहम सुझाव दिए हैं। तीन राज्यों में सूख चुकी 11 नदियों को पुनर्जीवित करने वाले राजेंद्र सिंह का दावा है कि नगर निगम और जनता के थोड़े से प्रयासों से शहर में पेयजल संकट खत्म हो सकता है।
शिमला पहुंचे राजेंद्र सिंह ने नगर निगम महापौर कुसुम सदरेट और उप महापौर राकेश शर्मा के साथ मंगलवार को सियोग और अश्वनी खड्ड परियोजना का जायजा लिया। सबसे पहले टीम ढली के साथ लगती सियोग परियोजना में पहुंचे। यह परियोजना पिछले छह माह से बंद पड़ी है। राजेंद्र सिंह ने कहा कि परियोजना का मॉडल अच्छा है, सिर्फ कैचमेंट एरिया में जल संरक्षण पर काम करने की जरूरत है। इसके बाद टीम अश्वनी खड्ड पहुंची। इस परियोजना से भी पिछले करीब तीन साल से पानी की सप्लाई बंद है। राजेंद्र सिंह ने कहा कि एसटीपी से नदी तक करीब ढाई किलोमीटर की दूरी है। यह पानी को शुद्घ करने के लिए काफी है। इसके लिए पहले एसटीपी की पानी शुद्घ करने की क्षमता बढ़ानी होगी। फिर नदी में भी पानी की शुद्घता बढ़ाने के सुझाव दिए।
निगम को दिए ये चार सुझाव
1. सियोग परियोजना के कैचमेंट एरिया में चैक डैम आदि बनाकर पानी संरक्षित किया जाए। बारिश का पानी नदी नाले में बहने से रोकना होगा ताकि भूमिगत जलस्तर बढ़ सके।
2. सीवरेज प्लांट से अश्वनी खड्ड में छोड़े गए पानी को बायो सेनिटाइजर, बायो तकनीक और पानी को शुद्घ करने वाली वनस्पति के जरिये फिल्टर किया जाए। इससे यह पानी पीने लायक हो जाएगा।
3. शिमला में सालाना 12 से लेकर सोलह सौ मिलीमीटर बारिश होती है। लेकिन ज्यादातर मकानों में रेन हार्वेस्टिंग नहीं है। निगम कानून बनाकर इसे अनिवार्य करे और पानी का बचाव करे।
4. शहर के साथ लगते कई चश्मे और झरने अब सूख गए हैं। इन्हें पुनर्जीवित करने के लिए सियोग मॉडल को शहर के साथ लगती वन भूमि पर लागू किया जाए। जनता खुद भी पानी का सदुपयोग समझे।
आखिर कौन हैं वाटरमैन
राजस्थान के रहने वाले राजेंद्र सिंह 1974 में बने तरुण भारत संघ के संस्थापक अध्यक्ष हैं। अकेले राजस्थान राज्य में अरवरी, सरसा, डगानी, जहाजवाली, सादी, महेश्वरा और सेरनी आदि नदियों को पुनर्जीवित करने का श्रेय राजेंद्र सिंह को जाता है। इसके अलावा महाराष्ट्र और कर्नाटक में भी सूख रही तीन नदियों में वे नई जान फूंक चुके हैं। वर्तमान में वह राष्ट्रीय स्तर की जल बिरादरी संस्था के अध्यक्ष हैं। अंग्रेजों के बसाए शिमला शहर की पेयजल व्यवस्था को देखकर वह हैरान थे। उन्होंने कहा कि अंग्रेजों ने सही प्लानिंग की थी। आबादी के हिसाब से पर्याप्त पानी का इंतजाम किया गया था। आजादी के बाद सरकारों ने इसका ध्यान नहीं रखा। आबादी बढ़ने के साथ पेयजल व्यवस्था बढ़ाने के भी प्रबंध करने चाहिए थे।