शिमला। टाउन एंड कंट्री प्लानिंग एरिया के तहत शिमला शहर में 45 डिग्री से कम ढलान वाली जमीन नहीं बची है। ऐसे में सरकार नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के समक्ष जमीन के ढलान की इस शर्त को खत्म करने की बात रखने जा रही है। तीन जुलाई को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में ढाई से अधिक मंजिला भवन बनाने की सुनवाई होनी है। इसमें सरकार 45 डिग्री जमीन के एंगल की भी बात भी रखेगी।
प्लानिंग एरिया में जबसे ढाई से अधिक मंजिला भवन निर्माण पर प्रतिबंध लगा है लोग न तो जमीनें खरीद पा रहे हैं और जिन्होंने प्लॉट ले रखे हैं वह मकान बना पा रहे हैं। टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग में जहां प्रतिदिन 10 से 20 नक्शे जमा होते थे वहां अब इक्का-दुक्का मकान बनाने के लिए ही नक्शे आ रहे हैं। टीसीपी का मानना है कि एक तो शिमला में जमीनें महंगी हैं अगर लोग जमीन खरीद लेते हैं तो मकान बनाने के लिए पैसा नहीं होता है। ऐसे में लोगों को ऋण पर निर्भर रहना पड़ता है। ऋण की किस्तें किरायेदारों से आ रहे किराये से चुकाई जाती हैं। लेकिन जमीन के ढलान और ढाई मंजिला से अधिक निर्माण पर लगी रोक के कारण लोगों को ऋण की किस्तें तक चुकाना मुश्किल हो गया है। सरकार ढाई से साढ़े तीन मंजिला तक भवन निर्माण की अनुमति मांग रही है।
शहर में समतल जमीन मिलना मुश्किल
शिमला शहर में 45 डिग्री से अधिक ढलान वाली जमीन पर लोग मकान नहीं बना सकते। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने शर्त लगा रखी है कि मकान 45 डिग्री से कम ढलान वाली जमीन पर ही मकान बनाने की अनुमति दी जाए। इस वजह से शहर में ऐसे सैकड़ों लोग हैं जो मकान बनाना चाहते हैं लेकिन इस शर्त की वजह से उनका घर बनाने का सपना पूरा नहीं हो पा रहा। यही नहीं शहर की भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए 45 डिग्री से कम ढलान वाली जमीन मिलना मुश्किल है। ऐसे में लोगों को यहां मकान बनाने के लिए 36 तरह के पचड़ों से गुजरना पड़ता है।