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दस साल में पैराक्वाट से हो चुकी हैं 41 मौतें

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अमर उजाला ब्यूरो
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शिमला। आईजीएमसी में पिछले दस सालों के आंकड़ों के मुताबिक 56 में से 41 लोगों की मौत पैराक्वाट जहर से हो चुकी है। कुल मिलाकर 42 से 82 फीसदी मौतें इस जहर से हो चुकी हैं।
जबकि, वर्ष 2017 में भी दिसंबर माह तक 17 रोगियों में से 14 की मौत हुई हैै। आईजीएमसी के नेफ्रोलॉजी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. संजय विक्रांत का कहना है कि समय पर अस्पताल न पहुंचने के कारण अधिकांश मरीजों की मौत हो जाती है। अगर इस जहर के पीने से पांच से छह घंटों के भीतर रोगी अस्पताल पहुंच जाता है तो उसकी जान बचाई जा सकती है।
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पैराक्वाट एक व्यापक रूप से फैलने वाला जहर है। डॉक्टर का कहना है कि कृषि करने वाले लोग पत्तियों और घास को खत्म करने के लिए इसका अधिक इस्तेमाल करते हैं। वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने भी इसे सबसे खतरनाक कीटनाशकों के बीच सूचीबद्ध किया है। संजय विक्रांत ने कहा कि इस जहर का उपयोग करने से व्यक्ति के प्रजनन संबंधी समस्या भी आती है। इसके अलावा तेजी से फेफड़े, गुर्दे और लीवर को भी काफी नुकसान पहुंचता है। इसके अलावा जहर के शरीर में फैलने के कारण मरीज को ऑक्सीजन की कमी और सांस लेने में भी दिक्कतें आती हैं। वहीं, इस जहर के लक्षण छह से बारह घंटों के भीतर दिखाई देने लगते हैं।
क्या होते हैं नुकसान
नेफ्रोलॉजी के विशेषज्ञ डॉक्टर के मुताबिक इस जहर के इस्तेमाल से आंखों को नुकसान के अलावा नकसीर होती है। दमा का रोग भी संभव है। इसके अलावा जिन लोगों ने इस जहर का सेवन किया होता है उसको मुंह का दर्द, उल्टी और पेट दर्द की शिकायत रहती है।
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नहीं बना है कोई एंटीडोट
वर्तमान में पैराक्वाट जहर के लिए किसी भी तरह का एंटीडोट नहीं बना है। शिमला में प्रेसवार्ता में आईजीएमसी के नेफ्रोलॉजी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉॅ. संजय विक्रांत ने इस बात का खुलासा किया है। उन्होंने कहा कि इससे बचने के लिए केवल रोकथाम पर ध्यान देने की आवश्यकता है। इसी के चलते दुनिया के कई हिस्सों में इस पर प्रतिबंध लगाया गया है। उन्होंने बताया कि 130 से अधिक देशों में इसका इस्तेमाल होता है, लेकिन प्रतिकूल स्वास्थ्य प्रभावों के कारण यूरोपीय संघ के सदस्यों सहित करीब 32 देशों ने इस पर प्रतिबंध या फिर इसके उपयोग की अनुमति नहीं दी है। इसके अलावा पैराक्वाट वितरण पर केरल में 2011 से प्रतिबंध है।
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