राजधानी शिमला को स्मार्ट सिटी बनने में अभी वक्त लगेगा। जयराम सरकार के बजट में इस बार भी 2905 करोड़ रुपये के स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट पर शहरवासियों को सिर्फ भरोसा ही मिला। उम्मीद थी कि सरकार प्रोजेक्ट के कई बड़े कामों को इस साल पूरा करने की घोषणा करेगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पिछले साल मार्च में पेश किए अपने पहले बजट में जयराम सरकार ने प्रोजेक्ट के तहत पहली किस्त मिलने की उम्मीद जताई थी। करीब 18 करोड़ रुपये की यह पहली किस्त साल के अंत में जाकर नसीब हुई।
शिमला को स्मार्ट बनाने की रफ्तार इतनी ढीली है कि पूरे साल में सिर्फ एक ही काम का टेंडर हो पाया। वो भी धरातल पर कब उतरेगा, इसका कोई पता नहीं। इस बार भी बजट में सिर्फ इतना भरोसा सरकार ने दिया है कि टेंडर प्रक्रिया जल्द पूरी की जाएगी। नगर निगम ने स्मार्ट सिटी मिशन के तहत हर प्रोजेक्ट को पांच साल के भीतर पूरा करने की समयसीमा निर्धारित की थी। लेकिन शुरुआती दो साल में तो टेंडर प्रक्रिया ही शुरू नहीं हो पाई है। प्रोजेक्ट के तहत शहर में नए रोपवे, लिफ्ट, एस्केलेटर, सुरंगे, पार्किंग, कामर्शियल कांपलेक्स, गरीबों के लिए आवास और नया ट्रांसपोर्ट सिस्टम बनाए जाने की योजनाएं हैं।
शहर को नहीं मिला कोई तोहफा, मोनोरेल का भी जिक्र नहीं
शहरवासियों को सरकार से इस बार शिमला शहर के लिए कुछ नई सौगातें मिलने की उम्मीद थी लेकिन झोली खाली ही रही। शहरी निकायों में कूड़ा संयंत्र की घोषणा सरकार ने की है लेकिन शिमला के भरयाल में पहले ही कूड़ा संयंत्र स्थापित हो चुका है। ऐसे में यहां नया संयंत्र नहीं लगेगा। शहर में ट्रैफिक की समस्या से निपटने को लेकर भी कोई घोषणा नहीं की गई। बजट में शिमला में प्रस्तावित मोनोरेल को लेकर भी कोई चर्चा नहीं की गई।
बंदरों और कुत्तों के आतंक से राहत नहीं
शहरवासियों को उत्पाती बंदरों और आवारा कुत्तों से राहत को लेकर भी कोई घोषणा नहीं की गई। सरकार ने बजट में नसबंदी का जिक्र तो किया है लेकिन लोगोें को कैसे इनके आतंक से निजात दिलाई जाए, इसकी कोई योजना नहीं बनी है।