देश की पहली महिला शिक्षक थीं सावित्री बाई फूले
- फोटो : @TeachersDay3Jan
सावित्रीबाई फुले ने सभी बाधाओं के बाद भी पढ़ाई करना शुरू कर दीं। बताया जाता है कि जब वह पढ़ने के लिए स्कूल जाती थीं, तो लोग उन्हें पथ्तर से मारते थे। यहीं नहीं लोग उनके ऊपर कूड़ा और कीचड़ भी फेंकते थे।
देश की पहली महिला शिक्षक थीं सावित्री बाई फूले
- फोटो : Twitter @TribalArmy
जब बालिकाओं को शिक्षा ग्रहण करना पापा माना जाता था, तब सावित्रीबाई ने लड़कियों की पढ़ाई के लिए स्कूल खोला। उन्होंने साल 1848 में महाराष्ट्र के पुणे में भारत के पहले बालिका स्कूल की स्थापना की थी। इसके बाद उन्होंने लड़कियों के लिए एक दो नहीं बल्कि 18 स्कूलों का निर्माण कराया।
देश की पहली महिला शिक्षक थीं सावित्री बाई फूले
- फोटो : Twitter @EnvirForUPSC
सावित्रीबाई फूले ने सिर्फ शिक्षा के लिए ही संघर्ष नहीं किया, बल्कि उन्होंने देश में कुरीतियों के खिलाफ भी आवाजा बुलंद की। उन्होंने छुआ-छूत, बाल-विवाह, सती प्रथा और विधवा विवाह निषेध जैसी कुरीतियों का विरोध किया और इनके खिलाफ लड़ती रहीं। जीवनभर उन्होंने महिलाओं के अधिकार के लिए संघर्ष किया।
देश की पहली महिला शिक्षक थीं सावित्री बाई फूले
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साबित्रीबाई फूले का जिन लोगों ने विरोध किया उसकी समाज की एक लड़की की उन्होंने जान बचाई। एक विधवा ब्राह्मण महिला आत्महत्या करने जा रही थी जिसका नाम काशीबाई था। काशीबाई गर्भवती थी और लोकलाज के डर से वह आत्महत्या करने जा रही थी, लेकिन साबित्रीबाई ने उनको खौफनाक कदम उठाने से रोका। वह काशीबाई को अपने घर आईं और डिलीवरी कराई। उन्होंने काशीबाई के बच्चे का नाम यशवंत रखा और उसे अपना दत्तक पुत्र बना लिया। सावित्रीबाई ने यशवंत को पढ़ा लिखाकर एक डॉक्टर बनाया।
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जिस समय भारत में जाति प्रथा चरम पर थीं, तब साबित्रीबाई फूले ने अंतरजातीय विवाह को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए। सावित्रीबाई ने अपने पति के साथ मिलकर 'सत्यशोधक समाज' की स्थापना की। यह बिना पुजारी ओर दहेज के शादी का आयोजन करता था। 1897 में पुणे में प्लेग फैल गया था जिसके कारण 66 साल की उम्र में सावित्रीबाई फुले का निधन हो गया। उन्होंने 10 मार्च 1897 को दुनिया को अलविदा कहा था।