महिलाओं को भी है पिंडदान का अधिकार
- फोटो : istock
वास्तव में, श्राद्ध शब्द श्रद्धा से बना है और श्रद्धा, श्राद्ध का प्रथम अनिवार्य तत्व है, अर्थात पितरों के प्रति श्रद्धा प्रकट करना ही श्राद्ध है। लेकिन प्रश्न यह है कि पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध-कर्म कौन-कौन कर सकता है? शास्त्रों में कहा गया है कि पिता का श्राद्ध पुत्र को करना चाहिए। एक से अधिक पुत्र होने पर सबसे बड़ा पुत्र श्राद्ध करता है। पुत्र के न होने पर पौत्र या प्रपौत्र को भी श्राद्ध करने का अधिकार प्राप्त है। पुत्र, पौत्र या प्रपौत्र के न होने पर पुत्री का पुत्र श्राद्ध-कर्म कर सकता है। इसके भी न होने पर भतीजा भी श्राद्ध कर सकता है। गोद लिया पुत्र भी श्राद्ध का अधिकारी होता है।
महिलाओं को भी है पिंडदान का अधिकार
- फोटो : अमर उजाला
स्मृति संग्रह और श्राद्ध कल्पलता के अनुसार, सपिंड अर्थात पूर्व की सातवीं पीढ़ी तक के परिवार का सदस्य, सोदक अर्थात आठवीं पीढ़ी से चौदहवीं पीढ़ी तक का पारिवारिक सदस्य भी श्राद्ध करने का अधिकारी माना गया है। इस क्रम में कोई न मिले, तो माता के कुल के सपिंड और सोदक को भी श्राद्ध करने का अधिकारी माना गया है।
लेकिन इन सब में महिलाओं को लेकर अक्सर यह सवाल उठते रहते हैं कि क्या वे श्राद्ध करने की अधिकारी हैं? किन परिस्थितियों में वे अपने पूर्वजों का पिंडदान करने की पात्र हैं?
महिलाओं को भी है पिंडदान का अधिकार
- फोटो : adobe stock
इस संबंध में शास्त्रों में कहा गया है कि यदि किसी के पुत्र न हो और पत्नी जीवित हो, तो ऐसी स्थिति में पत्नी दिवंगत पति की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध-कर्म कर सकती है। किसी के न होने पर पुत्री भी श्राद्ध-कर्म कर सकती है। उसी कुल की विधवा स्त्री भी पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध-कर्म कर सकती है। पिता एवं माता के कुल में कोई न हो, तो स्त्री को भी श्राद्ध करने का अधिकार प्राप्त है। लेकिन श्राद्ध करने से नाबालिग लड़कियों को रोका गया है, लेकिन विवाहित महिलाएं श्राद्ध करने की पात्र हैं। पति या पुत्र बीमार है, तो उसके हाथ का स्पर्श कराकर महिला श्राद्ध-कर्म कर सकती है। घर में कोई वृद्ध महिला है, तो युवा महिला से पहले श्राद्ध करने का अधिकार उसका होगा।
महिलाओं को भी है पिंडदान का अधिकार
- फोटो : istock
विधवा स्त्री अगर संतानहीन हो
वैदिक परंपरा के अनुसार, महिलाएं यज्ञ, अनुष्ठान, संकल्प और व्रत आदि तो रख सकती हैं, लेकिन श्राद्ध की विधि को स्वयं नहीं कर सकती हैं। विधवा स्त्री अगर संतानहीन हो, तो अपने पति के नाम श्राद्ध का संकल्प रखकर ब्राह्मण या पुरोहित परिवार के पुरुष सदस्य से ही पिंडदान आदि का विधान पूरा करा सकती है। इसी प्रकार जिन पितरों के कन्याएं ही वंश परंपरा में हैं, तो उन्हें पितरों के नाम व्रत रखकर उसके दामाद या धेवते, नाती आदि ब्राह्मण को बुलाकर श्राद्ध-कर्म की निवृत्ति करा सकते हैं। साधु-संतों के शिष्य गण या शिष्य विशेष श्राद्ध कर सकते हैं।