रेवती वीरमणि मदुरई के एक बहुत ही गरीब परिवार से आती हैं और उन्होंने अपने जीवन में बहुत संघर्ष देखा है। आज रेवती भारत के लिए ओलंपिक्स में भाग लेने जा रही हैं। वे कई सारी लड़कियों के लिए मिसाल बन चुकी हैं। एक समय ऐसा भी था जब उनके पास खाने तक को रुपये नहीं हुआ करते थे लेकिन वे खेलती रहीं और आज सफलता उनसे बस कुछ कदम दूर है। विस्तार से जानिए रेवती की कहानी।
दादी के साथ रहीं
रेवती ने बहुत छोटी उम्र में ही अपने माता-पिता को खो दिया था जिसके बाद से दादी ही उनका पालन-पोषण कर रही हैं। दादी के पास भी इतने पैसे नहीं हुआ करते थे कि वे उन्हें पढ़ा- लिखा सकें। सरकारी हॉस्टल में दादी ने उन्हें दाखिला दिला दिया और वहां ही उन्होंने दौड़ना शुरू कर दिया था।
जूते लेने के लिए पैसे नहीं थे
रेवती के पास एकसमय जूते खरीदने के तक पैसे नहीं हुआ करते थे। यह ऐसा समय था कि रेवती को नंगे पैर दौड़ना पड़ता था। उन्होंने सफलता हासिल करने के लिए ये भी किया। रेवती साल 2016 में जूनियर राष्ट्रीय प्रतियोगिता में दो गोल्ड मेडल और सीनियर प्रतियोगिता में सिल्वर मेडल हासिल कर चुकी हैं।
रेलवे में लगी नौकरी
खेल कोटे से 2019 में रेवती को क्लर्क के तौर पर रेलवे में नौकरी मिल गई जिसके बाद उनका जीवन थोड़ा सुधरा है। रेवती आज ऑलंपिक में भाग लेने जा रही हैं और पूरे देश को उनसे मेडल की उम्मीद भी है। रेवती ने यह मुकाम अपनी मेहनत से हासिल किया है।