नागलक्ष्मी की प्रगनाननंदा की सफलता में भूमिका
बचपन से ही जब भी प्रगनाननंदा किसी टूर्नामेंट के लिए जाते तो उन्हें लानेऔर ले जाने की जिम्मेदारी मां नागलक्ष्मी की होती थी। वह पूरा प्रयास करती कि बेटा अपनी प्रैक्टिस करें, घर पर प्रैक्टिस के लिए अनुकूल माहौल हो। घर से दूर होने पर प्रगनाननंदा को घर का बना खाना खाने को मिले।
नागलक्ष्मी को खुद शतरंज के खेल के बारे में अधिक नहीं पता लेकिन वह एक नजर में यह जान जाती हैं कि मैच के दौरान उनका बेटा कब आश्वस्त है और कब निराश। कई बार तो बेटे की घंटों ट्रेनिंग चलती हैं, तब भी नागलक्ष्मी कमरे के एक कोने में बैठी इंतजार करतीं और ट्रेनिंग खत्म होने के बाद घर पहुंचकर अपने काम निपटाती हैं।
प्रगनाननंदा की बहन
प्रगनाननंदा ने तीन वर्ष की आयु से ही शतरंज खेलना शुरू कर दिया था। इसकी वजह उनकी बड़ी बहन वैशाली हैं। वैशाली को शतरंज का खेल पसंद था। वह शतरंज खेला करतीं, जिसे देख प्रगनाननंदा में भी शतरंज खेलने की इच्छा जागृत हुई। वैशाली भी भाई को टीवी पर कार्टून देखने से दूर रखना चाहती थीं, इसलिए उन्होंने प्रगनाननंदा को शतरंज की चालें सिखाईं।
प्रगनाननंदा और वैशाली एक साथ प्रैक्टिस करते हैं। साथ में टूर्नामेंट के लिए जाया करते हैं। एक दूसरे को प्रोत्साहित करते हैं। मां नागलक्ष्मी और बहन वैशाली के प्रयासों का परिणाम था कि साल 2018 में महज 12 वर्ष की आयु में प्रगनाननंदा ग्रैंडमास्टर बन गए। विश्वनाथन आनंद को पीछे छोड़ते हुए वह भारत के सबसे युवा ग्रैंडमास्टर बने। साथ ही प्रगनाननंदा दुनिया के दूसरे सबसे युवा ग्रैंडमास्टर बनें। पहले नंबर पर यूक्रेन के सिर्जी कर्जाकिन का नाम आता है, जो 12 साल की उम्र में ग्रैंडमास्टर बन गए थे।