सविता ने दो बच्चों को जन्म दिया लेकिन ससुराल वालों की प्रताड़ना कम नहीं हुई। तंग आकर सविता ने आत्महत्या का मन बना लिया और फांसी का फंदा तैयार किया। रिपोर्ट के मुताबिक, जब सविता आत्महत्या करने जा रही थीं, तो उनकी सांस उन्हें खिड़की से देख रही थीं, लेकिन उन्होंने सविता को रोका तक नहीं। इससे सविता की सोच बदली। उन्होंने सोचा कि उनके आत्महत्या करने से कुछ नहीं बदलेगा, बल्कि उनके बच्चों का भविष्य खराब हो जाएगा।
अफसर बनने की राह
सविता ने अपने बच्चों को इस पारिवारिक क्लेश से दूर रखने और उनका भविष्य सुधारने का निर्णय लिया और ससुराल छोड़ दिया। बच्चों को लेकर ससुराल की दहलीज पार की तो उनका पालन पोषण करने के लिए एक पार्लर में काम करना शुरू किया। इस दौरान उन्होंने दोबारा पढ़ाई शुरू की। इंदौर विश्वविद्यालय से पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में मास्टर की डिग्री हासिल की। फिर प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी शुरू की।
पहले ही प्रयास में परीक्षा की पास
वर्ष 2006 में सविता प्रधान ने प्रतियोगी की परीक्षा पास की। उन्हें मध्य प्रदेश में नियुक्ति मिली। इस दौरान उनका चार महीने का बच्चा था, जिसे लेकर सविता दफ्तर जाया करती थीं। वर्तमान में वह मध्य प्रदेश नगर निगम आयुक्त के पद पर कार्यरत है।