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अफगानिस्तानः मुल्क जहां औरत बदन भी ढंके और नाम भी छुपाए

Fri, 31 Jul 2020 03:32 PM IST
अपराजिता शुक्ला लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Pixabay
डॉक्टर ने बताया कि उसे कोविड-19 की बीमारी है। राबिया घर लौट जाती है। दर्द और बुखार बना रहता है। डॉक्टर दवाओं के लिए एक पर्ची देता है ताकि उसका पति उसके लिए दवाएं खरीद सके। लेकिन जैसे ही उसका पति डॉक्टर की पर्ची पर बीवी का नाम देखता है, भड़क जाता है, पत्नी को पीटता है कि क्यों उसने 'एक अजनबी' को अपना नाम बताया। अफगानिस्तान में ये आम बात है। परिवार के लोग अकसर ही घर की महिलाओं को 'बाहरी लोगों' के सामने अपना नाम छुपाने के लिए दबाव डालते हैं। भले ही वो डॉक्टर ही क्यों न हो। लेकिन अब इस चलन के ख़िलाफ आवाज उठनी शुरू हो गई है। कुछ महिलाएं नाम बताने के अपने हक के लिए लड़ाई लड़ रही है।


 
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सांकेतिक तस्वीर
'मेरा नाम कहां है?'
अफगानिस्तान में महिलाओं के लिए ये परेशानी बहुत पहले ही शुरू हो जाती है। जब एक लड़की पैदा होती है। एक उम्र गुजर जाने के बाद उसको एक नाम मिलता है। जब उसकी शादी होती है तो आमंत्रण पत्र पर उसके ही नाम का जिक्र नहीं होता है। जब वो बीमार पड़ती है तो डॉक्टर की पर्ची पर अकसर ही उसका नाम नहीं लिखा जाता है। और जब वो मर जाती है तो उसका नाम न तो मृत्यु प्रमाणपत्र पर होता है और न ही उसकी कब्र पर लगे पत्थर पर। यही वजह है कि आज कुछ अफगान महिलाएं अपना नाम आजादी से इस्तेमाल कर सकें, इसलिए मुहिम चला रही हैं। उन्होंने इसके लिए एक नारा भी दिया है, 'मेरा नाम कहां है?' WhereIsMyName? के स्लोगन का इस्तेमाल पोस्टरों और सोशल मीडिया पर भी किया जा रहा है।


 
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सांकेतिक तस्वीर
'भाई, बाप, और मंगेतर की इज्जत'
राबिया हेरात सूबे में रहती हैं। उन्हीं के सूबे की एक औरत ने बीबीसी से बात की। वो न तो अपना नाम जाहिर करना चाहती थीं और न ही रेडियो के लिए आवाज ही देना चाहती थीं। लेकिन मर्दों के इस बर्ताव पर उन्होंने कोई एतराज नहीं था। वे इसे वाजिब भी ठहरा रही थीं। वो कहती हैं, "जब कोई मुझे अपना नाम बताने के लिए कहता है तो मुझे अपने भाई, अपने बाप और अपने मंगेतर की इज्जत के बारे में सोचना पड़ता है। और मैं अपना नाम बताने से इनकार कर देती हूं। मैं अपने परिवार को क्यों दुखी करूं। अपना नाम बताने की जरूरत ही क्या है?""मैं चाहती हूं कि लोग मुझे फलाने की बेटी, फलाने की बहन कह कर बुलाएं। और भविष्य में मैं अपने शौहर की बेगम और उसके बाद अपने बेटे की मां कह कर पुकारा जाना पसंद करूंगी।" ये कहानियां चौंका देने वाली हैं लेकिन इसमें कुछ भी अनूठा नहीं है। अफगानिस्तान में महिला के नाम के इस्तेमाल पर लोग तैयार नहीं होते हैं और कुछ इलाक़ों में तो लोग इसे तौहीन तक समझते हैं। बहुत से अफगान मर्द सार्वजनिक तौर पर अपनी मां, बहन या बीवी का नाम लेने में हिचकिचाते हैं क्योंकि ऐसा करना शर्मनाक माना जाता है। अफगान समाज में महिलाओं का जिक्र अमूमन घर के सबसे बड़े मर्द की मां, बेटी या बहन के नाम से किया जाता है। अफगानिस्तान के कानून के अनुसार जन्म प्रमाणपत्र में केवल पिता का नाम दर्ज किया जाना चाहिए।
 

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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
शौहर की 'गैरमौजूदगी'
नाम के इस्तेमाल पर इन बंदिशों से जो व्यावहारिक समस्याएं आती हैं, उसके अलावा कुछ भावनात्मक मुद्दे भी हैं। फरीदा सादात की शादी बचपन में ही कर दी गई थी। पंद्रह साल की उम्र में वो मां बन गई थीं। बाद में उनके पति उनसे अलग हो गए। फरीदा अपने चार बच्चों के साथ जर्मनी आ गईं। फरीदा का कहना है कि उनके बच्चों की जिंदगी में उनके शौहर का कोई वजूद नहीं है। इसलिए उनका मानना है कि उस शख्स को कोई हक नहीं कि उसका नाम 'मेरे बच्चों के पहचान पत्र' पर रहे। "मैंने अपने सभी बच्चों की परवरिश खुद की है। मेरे शौहर ने मुझे तलाक देने से इनकार कर दिया था। इसलिए मैं दोबारा शादी नहीं कर सकी।" "अफगानिस्तान में एक से ज्यादा बीवियां रखने वाले कई मर्द हैं। जैसे कि मेरे पति। ऐसे लोग अपने बच्चों की देखभाल नहीं करते हैं। अफगानिस्तान के राष्ट्रपति से मेरी अपील है कि वे कानून बदलें और माताओं के नाम उसके बच्चों के बर्थ सर्टिफिकेट और पहचान पत्र पर दर्ज करवाएं।"
 
 
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सांकेतिक तस्वीर
मुहिम की शुरुआत
लेकिन तीन साल पहले 28 साल की एक अफगान महिला लालेह उस्मानी ने इन हालात से तंग आकर खुद से ये कहा, "इसे ऐसे ही चलने नहीं दिया जा सकता है।" लालेह उस्मानी भी राबिया की तरह हेरात में ही रहती हैं। उन्हें 'मेरा नाम कहां है?' की मुहिम शुरू करने का विचार आया। ताकि अफगान महिलाओं को अपना नाम इस्तेमाल करने का 'बुनियादी हक' हासिल करने में मदद मिल सके। लालेह उस्मानी बीबीसी की अफ़ग़ान सेवा से कहती हैं कि वो और उनकी दोस्त अफगानिस्तान की औरतों के सामने बस एक सवाल रखना चाहती थीं कि आखिर क्यों उन्हें उनकी पहचान से मरहूम रखा जा रहा है। वो बताती हैं, "बच्चों के बर्थ सर्टिफिकेट पर पिता के साथ-साथ मां का नाम भी रहे, अफगानिस्तान की हुकूमत को इसके लिए तैयार करना हमारी मुहिम का मकसद है और हम इस लक्ष्य के एक कदम भर की दूरी पर हैं।" हाल ही में अफगानिस्तान की संसद की सदस्य मरियम सामा ने भी संसद में इस अभियान के बारे में बात की थी और महिलाओं के हक़ में आवाज उठाई थी। लालेह को लगता है कि इससे हालात बदलेंगे।
 
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- फोटो : BBC
लोगों की प्रतिक्रियाएं
लालेह उस्मानी का इंटरव्यू बीबीसी के फेसबुक पेज पर पोस्ट होने के बाद कुछ लोगों ने इस पर सकारात्मक प्रतिक्रियाएं दीं तो कुछ इसे लेकर आलोचनात्मक थे। कुछ लोगों ने मजाक उड़ाते हुए कहा कि अगली बार लालेह सभी रिश्तेदारों के नाम बर्थ सर्टिफिकेट पर लिखवाने के लिए मुहिम चलाएंगी। कुछ ने कहा कि परिवार में शांति बनाए रखने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। लालेह का कहना है कि अफगानिस्तान की नौजवान पीढ़ी को लेकर वो निराश हैं। लेकिन ऐसा नहीं है कि सोशल मीडिया पर हर कोई इस मुहिम का विरोध ही कर रहा है। कुछ बड़े नाम इसके समर्थन में शुरू से हैं तो कुछ बाद में जुड़े हैं। अफगानिस्तान के समाजशास्त्री अली कावेह कहते हैं,  "पितृ सत्तात्मक समाज होने की वजह से इज्जत के नाम पर औरतों को न केवल बदन ढंकने के लिए कहा जाता है बल्कि नाम छुपाने के लिए भी मजबूर किया जाता है। अफगान समाज में सबसे शरीफ औरत वो है जिसे न कभी देखा गया हो और न ही जिसके बारे में कभी किसी ने सुना हो।" "इसके लिए यहां कहा जाता है कि 'जिसे न आफताब (सूरज) ने देखा हो और न महताब (चांद) ने।' जो मर्द जितना सख्त होगा, समाज में उसकी उतनी ज्याजा इज्जत होगी। अगर परिवार की महिला सदस्य आजाद ख्याल वाली हुईं तो उन्हें बदचलन माना जाता है।" मुल्क में तालिबान की हुकूमत के पतन के तकरीबन दो दशक होने को हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी कोशिशें जारी हैं कि महिलाओं को सार्वजनिक जीवन में लाया जाए। लेकिन राबिया जैसी औरतें आज भी डॉक्टर को अपना नाम बताने पर पति की मार खाती हैं।
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