स्त्री मन की दबी हुई पीड़ा को उकेरती लेखनी
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आशापूर्णा देवी को पढ़ने की और स्वतन्त्रता तब मिली जब उनके पिता जगह की कमी की वजह से अपने संयुक्त परिवार से अलग हो एक बड़े घर में रहने चले गए। यहाँ अब माँ सहित सभी लड़कियों के लिए पुस्तकों व पत्रिकाओं की पर्याप्त खेप आने लगी। लेकिन चुनौतियाँ अब भी खत्म नहीं हुई थीं। जो सुविधाएँ थीं वो घर के भीतर थीं, बाहर जाकर पढ़ने और सीखने पर अब भी पहरा था। इसके बावजूद किताबों को अपना सच्चा दोस्त बनाकर आशापूर्ण जी ने दुनिया जहान का ज्ञान पाना शुरू कर दिया था और मात्र 13 साल की उम्र में उन्होंने एक कविता लिखकर चुपके से बच्चों की एक पत्रिका को भेज दी।
कविता का शीर्षक था-'बाइरेर डाक' यानी सामान्य भाषा में समझें तो बाहर की दुनिया के संकेत। कविता न केवल छपी बल्कि सम्पादक ने आशापूर्णा देवी से आग्रह किया कि वे और लिखें। बस यहाँ से लेखक आशापूर्णा देवी का रचनात्मक सफर शुरू हो गया।
क्रांतिकारी स्त्री पात्र
मात्र 15 वर्ष की आयु में आशापूर्णा देवी का विवाह हो गया लेकिन पति ने उनके लिखने-पढ़ने को लेकर समर्थन दिया और उन्होंने लिखना जारी रखा। शुरूआती ज्यादातर पुस्तकें बच्चों के लिए थीं। करीब 27 वर्ष की उम्र में 1936 में उन्होंने पहली कहानी वयस्क पाठकों के लिए लिखी 'पत्नी ओ प्रेयोशी' जो कि आनंद बाज़ार पत्रिका में छपी और इसके बाद आया उनका पहला उपन्यास 'प्रेम ओ प्रोयोजन।' उनके उपन्यासों, कहानियों के स्त्री पात्रों की पीड़ा और सामाजिक रूप से स्त्रियों के लिए बनाई गई बेड़ियों का सच उनके क्रन्तिकारी स्वभाव का परिचायक थी जिसने उस दौर के पुरुषसत्तावादी सोच रखने वालों को चौंका और डरा दिया था।
मन में वे भी जानते थे कि आशापूर्णा देवी कड़वा सच लिख रही थीं लेकिन इस सच को खुलेआम स्वीकार करने का न तो किसी में साहस था न ही इसका अनुसरण करने की हिम्मत। इसके बावजूद आशापूर्णा देवी महिलाओं के लिए सशक्तिकरण और अपने अस्तित्व की पहचान से जुड़ने का माध्यम बनीं। उनकी सबसे चर्चित पुस्तक श्रृंखला (तीन भागों में- प्रथम प्रतिश्रुति, स्वर्णलता व बकुल कथा) तीन पीढ़ियों की अनूठी, बेहद सुंदर और सार्थक कहानी है। जो पाठकों को महिलाओं के जीवन में पीढ़ी दर पीढ़ी आये परिवर्तनों से भी रूबरू करवाती है।
इसके अलावा उन्होंने करीब तीस से अधिक उपन्यास, अनेक कविताएं और कहानियां लिखीं जो आज भी प्रासंगिक हैं और रचनात्मकता का अद्भुत उदाहरण हैं। ज्ञानपीठ और पद्मश्री से सम्मानित इस विदुषी महिला ने करीब 86 वर्ष की आयु में 1995 में इस दुनिया को अलविदा कहा लेकिन उनका लिखा एक-एक शब्द आज भी उनके साहसिक और क्रांतिकारी लेखन का सशक्त हस्ताक्षर है।