फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

सबके राम: राम मंदिर आंदोलन के समय ट्रैक्टर के पीछे था, वरना सीधे सीने में लगती गोली

Thu, 04 Jan 2024 12:23 PM IST
चमन शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, अलीगढ़

सार

लोधा क्षेत्र के गांव अटलपुर निवासी योगीराज हितैषी बाबा भी मंदिर आंदोलन में कूद पड़े थे।अयोध्या में सरयू नदी पुल पर चली गोली में वह बाल-बाल बचे थे। उनके सामने तमाम कारसेवकों ने सरयू में छलांग लगा दी थी। योगीराज हितैषी बाबा कहते हैं कि उस समय को याद करते हैं तो सारी तस्वीरें आंखों के सामने नुमाया हो जाती हैं। आइए, सुनते हैं उनसे ही राम मंदिर आंदोलन की कहानी उनकी जुबानी...
विज्ञापन
योगीराज हितैषी बाबा - फोटो : स्वयं
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

राम मंदिर आंदोलन में अलीगढ़ की माटी हमेशा उर्वरा रही है। मंदिर के लिए यहां से उठी आवाज देश के कोने-कोने तक पहुंची है। इसलिए 1990 के दशक में चले राम मंदिर आंदोलन में यहां के कारसेवकों का उत्साह देखते ही बनता था। कारसेवक राम मंदिर के लिए अपने प्राण न्योछावर करने से भी पीछे नहीं रहे। लोधा क्षेत्र के गांव अटलपुर निवासी योगीराज हितैषी बाबा भी मंदिर आंदोलन में कूद पड़े थे।

विज्ञापन


अयोध्या में सरयू नदी पुल पर चली गोली में वह बाल-बाल बचे थे। उनके सामने तमाम कारसेवकों ने सरयू में छलांग लगा दी थी। योगीराज हितैषी बाबा कहते हैं कि उस समय को याद करते हैं तो सारी तस्वीरें आंखों के सामने नुमाया हो जाती हैं। आइए, सुनते हैं उनसे ही राम मंदिर आंदोलन की कहानी उनकी जुबानी...

मैं 1982 में अलीगढ़ आ गया था। उस समय राम मंदिर के लिए आवाज उठनी शुरू हो गई थी। विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष रहे अशोक सिंघल की अगुवाई में मंदिर आंदोलन शुरू होने लगा था। उन्होंने संत समाज का आह्वान किया। मुझे लगा कि प्रभु राम के मंदिर के लिए मुझे भी योगदान देना चाहिए। संत का काम सिर्फ त्याग और साधना नहीं, रामकाज़ भी है। इसलिए 1990 में कुछ संतों के साथ मैं भी कारसेवा के लिए अयोध्या चल पड़ा। ट्रेन से कानपुर पहुंचा तो पुलिस का सख्त पहरा था। अयोध्या की ओर जाने वाली ट्रेनों में चेकिंग थी, इसलिए वहां से सीधे प्रयागराज (उस समय इलाहाबाद) पहुंच गया। प्रयागराज से अयोध्या जाने वाली बसें रोक दी गई थीं। कोई साधन नहीं था। इसलिए हम लोग छोटे-छोटे वाहनों से अयोध्या की ओर चल पड़े। तमाम जगहों पर ट्रैक्टर और मोटरसाइकिल वालों से मदद लेकर अयोध्या की ओर बढ़ते रहे। कुछ जगहों पर पैदल ही चलना पड़ा।

विज्ञापन
विज्ञापन

गांवों में गजब का था उत्साह

उस समय जिन गांव से होकर निकलते थे, वहां के लोगों का उत्साह देखते बनता था। गांव के लोग संतों और कारसेवकों को देखते ही दौड़ पड़ते थे। बड़े आदर सत्कार के साथ गांव में भोजन आदि कराते थे। इससे अयोध्या तक का सफर पता नहीं चला। 29 अक्टूबर 1990 को किसी तरह अयोध्या पहुंच गया। अयोध्या की घेराबंदी देखकर चकित रह गया। विवादित ढांचे के तरफ कटीले तार लगा दिए गए थे, चारों तरफ बैरिकेडिंग थी। वहां तक पहुंच पाना मुश्किल हो रहा था। फिर हम लोग संतों की टोली के साथ अयोध्या के बाहरी क्षेत्र में ही भ्रमण करते रहे। कोशिश यही थी कि किसी भी तरह से विवादित ढांचे तक पहुंच जाए और उसे ढहा दें।

अचानक चली गोली, बाल-बाल बचा
दो-तीन दिन भ्रमण करने के बाद आखिरकार सरयू पुल पर दो नवंबर को पहुंच गया। कारसेवक विवादित ढांचे की ओर बढ़ने के लिए जोश भर रहे थे। तभी तत्कालीन शासन के आदेश पर पुलिस ने गोलियां चलवा दीं। मैं सरयू नदी पुल के पास एक ट्रैक्टर ट्राली के पीछे था। गोली सीधे ट्रैक्टर पर लगी। यदि उस समय थोड़ा भी इधर-उधर होता तो गोली मेरे सीने या शरीर में लग जाती। गोली चलते ही भगदड़ मच गई। चारों तरफ अफरा-तफरी का माहौल था। तमाम लोग मेरे सामने जान बचाने के लिए सरयू नदी में कूद पड़े।

वहां से बहुत मुश्किल से निकल पाए। भगदड़ में तमाम लोग गिर गए थे। उस समय मेरी युवावस्था थी। कई लोगों को हमने संतों की मदद से उठाया। पुलिस की सख्ती देखकर फिर वहां से निकलना पड़ा। उस समय मुख्यमंत्री मुलायम सिंह की दमनकारी कार्रवाई से बहुत गुस्सा भर गया था। तमाम लोग सरयू में जान गंवा बैठे थे। उसी दिन कोलकाता के दोनों कोठारी भाई भी शहीद हो गए थे। इन सभी के बलिदान से राम मंदिर का निर्माण संभव हो सका है। 22 जनवरी का दिन मेरे जीवन का सबसे सुनहरा पल होगा क्योंकि राम मंदिर आंदोलन का मैं भी साक्षी रहा हूं।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें