उस समय जिन गांव से होकर निकलते थे, वहां के लोगों का उत्साह देखते बनता था। गांव के लोग संतों और कारसेवकों को देखते ही दौड़ पड़ते थे। बड़े आदर सत्कार के साथ गांव में भोजन आदि कराते थे। इससे अयोध्या तक का सफर पता नहीं चला। 29 अक्टूबर 1990 को किसी तरह अयोध्या पहुंच गया। अयोध्या की घेराबंदी देखकर चकित रह गया। विवादित ढांचे के तरफ कटीले तार लगा दिए गए थे, चारों तरफ बैरिकेडिंग थी। वहां तक पहुंच पाना मुश्किल हो रहा था। फिर हम लोग संतों की टोली के साथ अयोध्या के बाहरी क्षेत्र में ही भ्रमण करते रहे। कोशिश यही थी कि किसी भी तरह से विवादित ढांचे तक पहुंच जाए और उसे ढहा दें।
अचानक चली गोली, बाल-बाल बचा
दो-तीन दिन भ्रमण करने के बाद आखिरकार सरयू पुल पर दो नवंबर को पहुंच गया। कारसेवक विवादित ढांचे की ओर बढ़ने के लिए जोश भर रहे थे। तभी तत्कालीन शासन के आदेश पर पुलिस ने गोलियां चलवा दीं। मैं सरयू नदी पुल के पास एक ट्रैक्टर ट्राली के पीछे था। गोली सीधे ट्रैक्टर पर लगी। यदि उस समय थोड़ा भी इधर-उधर होता तो गोली मेरे सीने या शरीर में लग जाती। गोली चलते ही भगदड़ मच गई। चारों तरफ अफरा-तफरी का माहौल था। तमाम लोग मेरे सामने जान बचाने के लिए सरयू नदी में कूद पड़े।
वहां से बहुत मुश्किल से निकल पाए। भगदड़ में तमाम लोग गिर गए थे। उस समय मेरी युवावस्था थी। कई लोगों को हमने संतों की मदद से उठाया। पुलिस की सख्ती देखकर फिर वहां से निकलना पड़ा। उस समय मुख्यमंत्री मुलायम सिंह की दमनकारी कार्रवाई से बहुत गुस्सा भर गया था। तमाम लोग सरयू में जान गंवा बैठे थे। उसी दिन कोलकाता के दोनों कोठारी भाई भी शहीद हो गए थे। इन सभी के बलिदान से राम मंदिर का निर्माण संभव हो सका है। 22 जनवरी का दिन मेरे जीवन का सबसे सुनहरा पल होगा क्योंकि राम मंदिर आंदोलन का मैं भी साक्षी रहा हूं।