कारसेवा के याद को किया साझा
31 अक्तूबर को रास्ते में अयोध्या पहुंचे कार सेवकों की ओर से बाबरी ढांचे के गुंबद के ऊपर विजय ध्वज फहराए जाने की सूचना मिली। इस सूचना ने मन में असीम साहस एवं ऊर्जा का संचार किया। नवंबर की पहली तारीख थी, जब हम भगवान राम की जन्मस्थली अयोध्या पहुंच गए। सायंकाल का समय था मणिराम छावनी परिसर में अशोक सिंघल दो नवंबर 1990 को राम जन्मभूमि परिसर घेरने का आह्वान कर रहे थे।
छावनी में एकत्र जनसमूह इतना विशाल था कि गेट से प्रवेश कर पाना संभव नहीं था। इसलिए हम लोग बाउंड्री के सहारे छत पर जाकर आंदोलन के नायक अशोक सिंघल का उद्बोधन सुनने लगे। दो नवंबर को योजनानुसार हनुमान गढ़ी वाले मुख्य मोर्चे में कारसेवा के लिए हम लोग आगे बढ़ गए। हम लोग मुख्य सड़क पर प्रवेश करने ही वाले थे कि छतों के ऊपर से गोलियों की बौछार होने लगी।
प्रभु श्रीराम को मुझसे कुछ और भी कार्य करवाना था, ऐसे में दैवीय संयोगवश मैं बच गया। कारसेवकों के संकल्प एवं धैर्य में कोई कमी नहीं आई। करीब घंटे भर बाद परमहंस महंत रामचंद्रदास महाराज की जीप आई और शहीद कोठारी बंधुओं के शवों सहित घायल कार सेवकों को ले गई। इसके बाद हम धीरे-धीरे पुलिस से बचते हुए छिपते हुए कारसेवकपुरम पहुंच गए। तीन नवंबर को सरकार से हुए समझौते के अनुसार हम लोगों को रोडवेज की बसों से प्रयागराज भेज दिया गया।
रामजन्मभूमि आंदोलन के दौरान कारसेवा का यह अनुभव स्मृति पटल पर अब भी अंकित है। इसपर समय की धूल नहीं जम पाई है। कारसेवकों का त्याग बलिदान ताजा है। संपूर्ण देश से आए कारसेवक मित्रों की याद आती रहती हैं। मन बेहद प्रसन्न है कि गुलामी के प्रतीक बाबरी ढांचा विध्वंस के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कुशल नीति के परिणामस्वरूप रामलला भव्य मंदिर में विराजमान होने जा रहे हैं। - प्रो. राजाराम यादव,कार सेवक, पूर्व कुलपति वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल यूनिवर्सिटी जौनपुर।