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मेरे राम : मानवीय मूल्यों की अवधारणा का प्रतीक हैं राम, राम से संबंध को शाश्वत बनाए रखना है जीवन का उद्देश्य

Thu, 11 Jan 2024 02:01 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

राम की उपाधि मर्यादा की है। मानवीय मूल्यों पर वही खरा उतरता है, जो मानवीय मर्यादा के पटल पर उज्ज्वल होता है। राम ने अपने मित्र, प्रजा और बांधवों से तो मर्यादा की परंपरा को माना ही, शत्रु के साथ भी कोई अमर्यादित आक्षेप नहीं किया।
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अयोध्या राम मंदिर। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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मैं 70 वर्ष का हूं। जब से मन में बोध आया, तब से श्रीराम की शरण में हूं। मेरे जीवन का उद्देश्य राम से अपने संबंध को शाश्वत रखना है। राम मानवीय मूल्यों की अवधारणा के प्रतीक हैं। मेरे राम ही एक मात्र ऐसे हैं, जिन्होंने धर्म को धारण भी किया और उस पर अमल भी। सारे लोक में राम से अच्छा कोई वक्ता नहीं है। अच्छा वक्ता वही है, जो उपदेश देने से पहले वैसा आचरण करता हो। ऐसे तो केवल राम जी ही हैं। राम के केवल इसी गुण को अपनाने से समाज में नैतिकता स्थापित हो जाएगी।

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राम की उपाधि मर्यादा की है। मानवीय मूल्यों पर वही खरा उतरता है, जो मानवीय मर्यादा के पटल पर उज्ज्वल होता है। राम ने अपने मित्र, प्रजा और बांधवों से तो मर्यादा की परंपरा को माना ही, शत्रु के साथ भी कोई अमर्यादित आक्षेप नहीं किया। मेरे राम करुणा, दया, त्याग, शौर्य और पराक्रम की प्रतिमूर्ति हैं। जीव मात्र का आधार भगवान राम हैं। मैं उनके आदर्श चरित्र के रूप का निरंतर ध्यान करता हूं। चिंतन से ही उनके मूल्य हमारे आचरण में उतरेंगे। इसी से हमारा कल्याण संभव है।

राम ने अपना सब कुछ सबको दे दिया। सभी संबंधों का निर्वहन किया और दीन-दुखियों का साथ दिया। दो कार्य कभी नहीं किए पराई स्त्री पर कुदृष्टि और शत्रु को पीठ दिखाना। उन्हें रघुवीर कहा जाता है। रघुवीर उसे कहते हैं, जिसमें पांच वीरताएं हों। त्याग वीरता, दया वीरता, विद्या वीरता, पराक्रम वीरता और धर्म वीरता। राम का जीवन इन पांचों वीरताओं का समागम है। मानवीय मूल्यों की इस अवधारणा में ही मुक्ति का मार्ग है।
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अयोध्या में बन रहा राम मंदिर इस अवधारणा को बल देगा। साथ ही यह राष्ट्र की अस्मिता और सम्मान का प्रतीक भी बनेगा। राम मंदिर को हमें धर्म और मर्यादा से जोड़ना चाहिए, स्पर्धा और ईर्ष्या से नहीं। राम जी किसी व्यक्ति विशेष या समुदाय के नहीं हैं। वे तो जन-जन के हैं। पशु-पक्षियों सहित प्राणी मात्र के हैं। मुझे भी 22 जनवरी को भगवान राम की प्राण प्रतिष्ठा में शामिल होने का निमंत्रण मिला है। मैं निश्चित रूप से जाऊंगा और न कुछ सही झोली से एक पुष्प ही निकालकर उनके चरणों में चढ़ा दूंगा। - जगद्गुरु श्री रामानुजाचार्य श्रीधराचार्य, बैकुंठ धाम, अलोपीबाग

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