राघव राग के लगभग सारे निबंध धर्मयुग और साप्ताहिक हिन्दुस्तान जैसी पत्रिकाओं में छपते रहे हैं। इतना ही नहीं इन्हें रामकथा मर्मज्ञ फॉदर कामिल बुल्के,धर्मयुग के संपादक डॉ.धर्मवीर भारती और महाकवि हरिवंशराय बच्चन का अपार स्नेह मिला।
पिता उमाकांत मालवीय कहते थे, जो आंखें पहले पहल राम की याद में डबडबा आई होंगी, संभवतः वही गंगोत्री है। रामकथा पढ़कर भी तो गंगा स्नान का ही सुख मिलता है। पिता के राघव राग ने हमें धरोहर के रूप में ऐसे ही विलक्षण राम दिए हैं, जिन्हें मैं बचपन से ही जीता और महसूस करता रहा हूं।
राघव राग से ही एक संदर्भ याद आता है । भरत प्रयाग आते हैं , गंगा और यमुना में अलग-अलग स्नान करते हैं, लेकिन संगम में स्नान से इन्कार कर देते हैं । पंडित-पुरोहित कहते हैं, संगम में स्नान पर तो विशेष पुण्य मिलता है, फिर आप संगम में क्यों नहीं स्नान कर रहे हैं ?
भरत कहते हैं, आप निश्चिंत रहें, दान-दक्षिणा में कोई कोताही नहीं होगी । मुझे संगम में नहाने को विवश न करें, वहां गंगा यमुना के साथ सरस्वती भी हैं । कहीं ऐसा न हो कि मैं संगम में स्नान कर भइया राम के खिलाफ़ ही खड़ा हो जाऊं।
मां कैकेयी बिना भइया राम के खाना खाए ख़ुद एक निवाला तक नहीं तोड़ती थीं । उन्हें सुलाकर ही सोती थी । उन्हें बहुत प्यार करती थीं, लेकिन जब सरस्वती उसकी जिह्वा पर आईं तो मेरी मां ही उनके खिलाफ़ खड़ी हो गईं और मेरे लिए तथा भइया के लिए वनवास मांग बैठीं।
ऐसे अनेक मर्मस्पर्शी प्रसंगों से जुड़ा है, राघव राग का महाराग। फिर पिता उमाकांत मालवीय याद आ रहे हैं, जो कहते थे, बेटा तुम्हें राम की नहीं, राम कथा की आयु मिले। मैं इसी तरह अपने राम को याद करते हुए आत्मा तक राम कथा की सुगंध से नहा जाता हूं।