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आइए, कथासागर में उतरें : मर्यादा पुरुषोत्तम राम नारियों के सम्मान के लिए संकल्पबद्ध

Sun, 21 Jan 2024 07:15 AM IST
दुष्यंत शर्मा राज चावला, अयोध्या

सार

श्रीराम ने ऋषि गौतम की पत्नी माता अहिल्या को शाप मुक्त कर उनका उद्धार किया। जन्म से यक्षिणी ताड़का का विवाह राक्षसकुल में हुआ तो ऋषियों के यज्ञ में बाधा उसकी आदत बन गई थी। अगस्त्य मुनि के शाप से उसका रूप बिगड़ा। ऋषि विश्वामित्र के निर्देश पर श्रीराम ने ताटका का वध कर उसे भी दुराचरण से मुक्त किया।
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भगवान राम और माता सीता - फोटो : social media
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विस्तार
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भारतीय समाज में नारी को देवी माना है। नारी को समाज में यथोचित स्थान दिलाने  के लिए प्रभु श्रीराम ने अपने आचरण से कई उदाहरण प्रस्तुत किए। कैकेयी के वरदान की लाज रखी। उनके सम्मान में कमी नहीं आने दी। वन भेजने वाली कैकेयी से श्रीराम कहते हैं...

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सुनु जननी सोइ सुतु बड़भागी। जो पितु मातु बचन अनुरागी॥
तनय मातु पितु तोषनिहारा। दुर्लभ जननि सकल संसारा॥
यानी हे माता! वही पुत्र बड़भागी है, जो पिता-माता के वचनों का अनुरागी है। आज्ञा पालन करके माता-पिता को संतुष्ट करने वाला पुत्र संसार में दुर्लभ है।

उस काल के राजा एक से अधिक रानियां रख सकते थे, पर श्रीराम ने जानकी जी को कहा कि किसी दूसरी स्त्री को उनके समकक्ष स्थान नहीं देंगे। श्रीराम के वनगमन में नारियों से सामना हुआ, किसी को शाप से मुक्ति दिलाई, तो किसी को सशक्त बनाया।

श्रीराम ने ऋषि गौतम की पत्नी माता अहिल्या को शाप मुक्त कर उनका उद्धार किया। जन्म से यक्षिणी ताड़का का विवाह राक्षसकुल में हुआ तो ऋषियों के यज्ञ में बाधा उसकी आदत बन गई थी। अगस्त्य मुनि के शाप से उसका रूप बिगड़ा। ऋषि विश्वामित्र के निर्देश पर श्रीराम ने ताटका का वध कर उसे भी दुराचरण से मुक्त किया। माता शबरी के आश्रम में उनके मुख से चखे बेर खाकर प्रभु ने उनका भी उद्धार किया। श्रीराम ने जब बाली का वध किया तो बिलखती पत्नी तारा को जीवन सार समझाया। 
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बाली के बाद उनका सम्मान बनाए रखा। श्रीराम के कहने से सुग्रीव किष्किन्धा के राजा बने तो रानी तारा को राजमहल में जीवनपर्यंत सम्मान मिला। रावण वध के बाद युद्धभूमि में पहुंची रानी मंदोदरी काफी दुखी हुईं। लंका का नया राजा विभीषण को घोषित करने के बाद श्रीराम ने उन्हें मंदोदरी से विवाह करने का सुझाव दिया, जिससे जीवनभर वे लंका की महारानी की तरह सम्मान की अधिकारी रहीं। रामराज्य में लोकमर्यादा के लिए माता जानकी के वनगमन के निर्णय को भी उन्होंने स्वीकार किया, फिर उसका अर्थ भले राजा रानी के पारिवारिक जीवन का त्याग ही क्यों न हो। इसीलिए राम सबके हैं, राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं।
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(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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