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Ayodhya Ram Mandir: विश्व का सबसे बड़ा राम मंदिर निर्माण आंदोलन कैसे हुआ सफल?

Fri, 19 Jan 2024 09:52 PM IST
अमर शर्मा विनोद बंसल

सार

विश्व हिंदू परिषद ने श्रेय स्वयं न लेकर सदैव पूज्य संतों व हिंदू समाज को ही दिया। कभी मार्ग दर्शक मंडल, तो कभी जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति, कभी मंदिर जीर्णोद्धार समिति तो कभी श्री राम जन्मभूमि न्यास, कभी श्री राम जन्म भूमि मुक्ति संघर्ष समिति तो अब श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास, हर बार पूज्य संतों का न सिर्फ मार्गदर्शन लिया, अपितु उन्हीं को सदैव आगे रख कर श्रेय दिया। उसका एक ही उद्देश्य रहा कि हिंदू संगठित होगा, तो राष्ट्र भी संगठित रहेगा। हिंदू समाज से ऊंच-नीच व भेद-भाव का अंत होगा, तो समाज समरस व खुशहाल बनेगा।  
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Ramlala - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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- विनोद बंसल
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विश्व हिंदू परिषद, जय श्रीराम का नारा तथा राम-मंदिर पर्याय से बन चुके हैं। अयोध्या का नाम आते ही भगवान राम की जन्मभूमि और विश्व हिंदू परिषद का नाम अनायास ही मानस पटल पर उभर कर आता है। विश्व जानता है कि अयोध्या भगवान श्री राम की जन्म-स्थली है। इसकी स्थापना वैवस्वत मनु महाराज ने सरयू के तट पर की थी। जन्मभूमि स्थित मंदिर का जीर्णोद्धार कराते हुए आज से लगभग 2100 वर्ष पूर्व सम्राट विक्रमादित्य द्वारा काले कसौटी के पत्थर वाले 84 स्तंभों पर विशाल व भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया, जिसे विदेशी आक्रांता बाबर के आदेश पर उसके सेनापति मीरबाकी ने 1528 में ध्वस्त कर उसी के मलबे से मंदिर की नींव पर ही मस्जिदनुमा ढांचा बनवाया।

मंदिर के ध्वंस का मुख्य कारण हिंदू समाज की आस्था पर प्रहार कर बल पूर्वक धर्मांतरण कराने की मानसिकता ही थी। मंदिर पर हुए इस प्रथम प्रहार को रोकने हेतु 15 दिनों तक लगातार संघर्ष चला। इन 15 दिनों में लगभग एक लाख, 76 हजार रामभक्तों के बलिदान दिया। किंतु अड़ियल मुगलिया सल्तनत ने तोपों से मंदिर को उड़ा दिया। 1528 से लेकर 1949 तक के कालखंड में भिन्न-भिन्न समयों में लगभग 76 युद्धों में लाखों रामभक्तों ने जीवन का बलिदान दिया। कभी हम जीते, तो कभी रुक गए। किंतु भगवान की जन्मभूमि पर हमने कभी दावा नहीं त्यागा। कभी कोई राजा लड़ा, तो कभी कोई जागीरदार, कभी कोई संत लड़ा, तो कभी कोई सामान्य नागरिक, कभी दर्शन-पूजन निकट से किया, तो कभी बहुत दूर से ही, कभी वहां पर भगवान को मूर्ति रूप में विराजमान देखा, तो कभी मात्र उनकी जन्मभूमि के ही दर्शन मिले। कभी मंदिर में दर्शन मिले, तो कभी चबूतरे पर बने टाट के टेंट में। रामभक्तों के मन में वेदना तो रहती ही थी, किंतु संतोष भी कि चलो जैसा भी है, पावन जन्मभूमि दर्शन का सौभाग्य तो मिला। भव्य मंदिर भी अवश्य ही बनेगा।
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हालांकि 1885 में भी एक निर्णय जन्मभूमि के पक्ष में तत्कालीन अंग्रेजी सरकार के काल में न्यायालय ने दिया था। किंतु स्वतंत्र भारत में पहला वाद अयोध्या निवासी गोपाल सिंह विशारद ने जनवरी, 1950 में फैजावाद के जिला न्यायालय में भगवान के दर्शन पूजन की अनुमति हेतु दायर किया। इसे उच्च न्यायालय ने भी पुष्ट कर दिया। दूसरा वाद रामानंद संप्रदाय के साधु परमहंस श्री रामचंद्र दास जी ने 5 दिसंबर, 1950 को दायर किया, जिसे अगस्त, 1990 में वापस ले लिया गया। तीसरा श्री पंचरामानंदी निर्मोही अखाड़े ने दिसंबर, 1959 में तथा चौथा दिसंबर, 1961 में सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के बाद और पंचम वाद भगवान श्रीराम लला विराजमान व स्थान श्रीराम जन्मभूमि द्वारा जुलाई, 1989 में दायर किया गया।

1949 से लगातार कानूनी कार्यवाही कछुए की चाल चलती रही। असल मोड़ तब आया, जब 1964 में जन्मे विश्व हिंदू परिषद ने अपनी तरुणाई के 19वें वर्ष में प्रवेश किया। आंदोलन की कमान तो संभाली, किंतु उसका श्रेय स्वयं न लेकर किसी और को देता चला गया। श्रीराम जन्मभूमि के साथ काशी और मथुरा की मुक्ति हेतु छह मार्च, 1983 को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में हुए हिंदू सम्मेलन में आह्वान करने वाले गुलजारी लाल नंदा तथा राज्य के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री व कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दाऊदयाल खन्ना थे। उन्होंने एक पत्र भी तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को लिखा।

इसके बाद श्रीराम जन्मभूमि की मुक्ति के लिए आंदोलनों की श्रृंखला सी बन गई। हालांकि इन आंदोलनों की औपचारिक घोषणा से पूर्व विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने 1983 के दिसंबर माह में देशव्यापी एकात्मता यज्ञ की अनूठी योजना बनाई, जिसके अंतर्गत हरिद्वार से रामेश्वरम तथा गंगासागर से सोमनाथ तक संपूर्ण भारत को एक करने हेतु छोटी बड़ी लगभग सौ यात्राओं ने 50 हजार किमी से अधिक का मार्ग तय किया तथा 29 दिसंबर को इन सभी का संगम नागपुर में हुआ।

उपरोक्त हिंदू सम्मेलन के आह्वान तथा एकात्मता यात्राओं के उत्साह ने जन्मभूमि की मुक्ति हेतु नव-ऊर्जा का संचार किया। परिणामत: 21 जुलाई, 1984 को अयोध्या के भगवताचार्य आश्रम में ‘श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति’ का गठन हुआ। गोरक्षपीठाधीश्वर पूज्य महंत अवैद्यनाथ जी महाराज को इसका अध्यक्ष तथा दाऊदयाल खन्ना को महामंत्री बनाया गया। 1984 में श्री राम जानकी रथ यात्राएं तथा उनकी सुरक्षा हेतु युवाओं की एक वाहिनी बजरंग-दल का गठन हुआ। जन्मभूमि की तालाबंदी के विरुद्ध अभियान तेज करने हेतु धर्मस्थल रक्षा समिति बनी। उडुप्पी में 31 अक्टूबर, 1985 को हुई धर्म संसद के आह्वान तथा पूज्य महंत रामचंद्र दास परमहंस द्वारा आत्म-बलिदान की धमकी के परिणाम स्वरूप एक फरवरी, 1986 राम लला ताले से मुक्त हो गए। देवोत्थान एकादशी यानी नौ नवंबर, 1989 को देश के चार लाख गांवों से पूजित शिलाओं के माध्यम से हरिजन बंधु कामेश्वर चौपाल के हाथों पूज्य संतों की उपस्थिति में मंदिर का शिलान्यास हुआ। इसके निमित्त देश में लगभग सात हजार स्थानों पर यज्ञ किए गए। 

इसके बाद पूज्य संतों के केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल के निर्णयानुसार 30 अक्टूबर, 1990 को कारसेवा की घोषणा ने राजनैतिक गलियारों में हल्ला मचा दिया। उसे रोकने के लिए केंद्र की वी. पी. सिंह सरकार तथा राज्य की मुलायम सिंह सरकार की लाख चेतावनियों, लाठी- डंडों व गोलियों को झेलते हुए कारसेवक लाखों की संख्या में, किसी भी मार्ग से, किसी भी वेश में व किसी भी ढंग से ‘राम लला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे’ के मर्मस्पर्शी व गगन भेदी उद्घोषों के साथ सिर पर केसरिया पटका बांधे अयोध्या पहुंच गए। दंभी शासक मुलायम सिंह ने कहा था कि ‘परिंदा भी पर नहीं मार सकता’। उत्साही रामभक्तों ने गुंबद पर भगवा भी पहरा दिया।

इसके बाद तो आडवाणी जी की रथ यात्रा हो या वी. पी. सिंह, चंद्रशेखर व पी. वी. नरसिंहा राव के साथ वार्ताओं का दौर और  छह दिसंबर, 1992 को बाबरी ढांचा ध्वंस का मामला हो या उसके पश्चात माननीय उच्च न्यायालय या माननीय सर्वोच्च न्यायालय में हुई सुनवाई की बात, सितंबर, 2010 का या नौ सितंबर, 2019 का ऐतिहासिक सर्वसम्मत आदेश। 1983 से लेकर 2020 तक विहिप की योजना, रचना, संचालन व संकट मोचक के रूप में इस आंदोलन में योगदान तो संपूर्ण विश्व ने प्रत्यक्ष देखा, किंतु उसने इस सब का श्रेय स्वयं न लेकर सदैव पूज्य संतों व हिंदू समाज को ही दिया। 
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कभी मार्ग दर्शक मंडल तो कभी जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति, कभी मंदिर जीर्णोद्धार समिति तो कभी श्री राम जन्मभूमि न्यास, कभी श्री राम जन्म भूमि मुक्ति संघर्ष समिति, तो अब श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास, हर बार पूज्य संतों का न सिर्फ मार्गदर्शन लिया, अपितु उन्हीं को सदैव आगे रख कर श्रेय दिया। उसका एक ही उद्देश्य रहा कि हिंदू संगठित होगा, तो राष्ट्र भी संगठित रहेगा। हिंदू समाज से ऊंच-नीच व भेद-भाव का अंत होगा, तो समाज समरस व खुशहाल बनेगा।
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