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Ayodhya Ram Mandir: इतिहास के झरोखे से राम मंदिर की संघर्ष गाथा

Fri, 19 Jan 2024 08:20 PM IST
अमर शर्मा ज्ञानेंद्र बरतरिया

सार

जब औरंगजेब ने श्रीराम जन्मभूमि मंदिर पर हमला करने का प्रयास किया, तो साधु-संतों और निहंगों की सेना ने डटकर संघर्ष किया और अंततः जीत हासिल की। लड़ाई के बाद निहंग पंजाब लौट गए। अंग्रेजी सत्ता के दौरान 28 नवंबर, 1858 को अवध के थानेदार के यहां शिकायत दर्ज की गई कि करीब 25 निहंग सिख अयोध्या की विवादित मस्जिद के ढांचे में घुस गए हैं और वहां हवन और पूजा शुरू कर दी है। उन्होंने मस्जिद के अंदर जबरन चबूतरा बना दिया है, मस्जिद के अंदर मूर्ति रख दी है, आग जलाई है और पूजा की है। उन्होंने कोयले से पूरी मस्जिद के अंदर राम-राम लिख दिया है।
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Ramlala - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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- ज्ञानेंद्र बरतरिया
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जीवन में कई बातों के लिए हम सत्ता, शक्ति और प्रभुत्व पर निर्भर रहते रहे हैं। शायद यह एक मानसिकता का भी रूप बन चुका है। लेकिन देश के इतिहास में कई ऐसे बिंदु हैं, जिनमें भारतीयों के त्याग और बलिदान ने सत्ता को, शक्ति को, प्रभुत्व को, मन में बैठा दी गई गलत बातों को चुनौती दी है और उसमें सफलता भी प्राप्त की है।

उदाहरण के लिए अगर कोई हमसे पूछे कि अंग्रेजी भारत की राजनैतिक सत्ता, सैनिक शक्ति और प्रभुत्व को चुनौती सबसे पहले कब और कहां दी गई, तो बहुत संभव है कि हमारे ध्यान में शायद पहला नाम मंगल पांडे का आए। लेकिन वास्तव में हमारी स्वतंत्रता का संग्राम असंख्य बलिदानों की सतत गाथा है।
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इस गाथा की समग्रता को समझने के लिए पहले उल्लेख करते हैं वीर अलगू मुतू कोणे (1681-1739) का। माना जाता है कि वे अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध भारत के प्रथम स्वंतत्रता सेनानी थे। उन्हें वीरन अलगू मुत्तू कोणे, अलगू मुत्तू कोणार व सर्वइकरार नामों से भी जाना जाता है। वीर अलगू मुतू कोणे का जन्म 11 जुलाई, 1710 को तूतीकोरिन जिले के कोविलपट्टी क्षेत्र में हुआ था। वे तमिलनाडु के मदुरै में मदुरै नायक के यादव सेनापति थे। लेकिन राजा के साथ कुछ गलतफहमी होने के बाद उन्होंने सेना छोड़ दी। 

एट्टायपुरम के पोलिगर राजा एट्टायपा नाइकर ने उन्हें तुरंत अपना लिया। ईस्ट इंडिया कंपनी और मरुथनायगम के खिलाफ एट्टयपुरम में विफल युद्धों के बाद वीर अलगू मुतू कोणे को शाही परिवार के साथ भागना पड़ा। उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ बगावत की। उन्हें और उनके 255 सैनिकों को, जिनमें सात सेनापति भी शामिल थे, अंग्रेजों ने पकड़ लिया। सिपाहियों के दाहिने हाथ काट दिए गए और वीर अलगू मुतू कोणे को तोप से बांध कर वर्ष 1759 में उड़ा दिया गया। 2015 में भारत सरकार ने उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया। पूरे 256 वर्ष बाद।

यह सिर्फ इस बात का उदाहरण नहीं है कि इतने वर्षों तक हम अपने बलिदानियों की उपेक्षा किस तरह करते रहे, बल्कि संभवतः यह एक अन्य पक्ष का भी उदाहरण है। वीर कोणे का निवास या महल- जो भी आप कहें, आज पूरी तरह जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है और यह एक स्मृति के विलोप होने की दिशा में स्पष्ट संकेत है।

स्मृति और संस्कृति का संरक्षण करना ही होगा, तभी आपकी स्वतंत्रता बनी रह सकती है। अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि मंदिर इसे समझने का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। राम जन्मभूमि मंदिर को मुगलों की राजनैतिक सत्ता, सैनिक शक्ति और प्रभुत्व के चंगुल से निकालने के लिए भी स्वतंत्रता की ही तरह असंख्य और सतत संघर्ष होते रहे हैं। इन्हीं में से एक संघर्ष छेड़ा था निहंग सिखों के एक जत्थे ने। 1672 में गुरु गोविंद सिंह जी के अयोध्या आने के प्रमाण अयोध्या के गुरुद्वारा श्री ब्रह्मकुंड साहिब में आज भी हैं। 

इसके बाद सरयू में काफी पानी बहा और सरयू के किनारे काफी रक्त बहा। जब औरंगजेब ने फिर श्रीराम जन्मभूमि मंदिर पर हमला करने का प्रयास किया, तो साधु-संतों और निहंगों की सेना ने डटकर संघर्ष किया और अंततः जीत हासिल की। लड़ाई के बाद निहंग पंजाब लौट गए।

अंग्रेजी सत्ता के दौरान 28 नवंबर, 1858 को अवध के थानेदार के यहां शिकायत दर्ज की गई। (कहीं-कहीं यह दिनांक 30 नवंबर बताई जाती है)। शिकायत में कहा गया था कि करीब 25 निहंग सिख अयोध्या की विवादित मस्जिद के ढांचे के अंदर घुस गए हैं और उन्होंने वहां हवन और पूजा शुरू कर दी है। उन्होंने मस्जिद के अंदर जबरन चबूतरा बना दिया है, मस्जिद के अंदर मूर्ति रख दी है, आग जलाई है और पूजा की है। इसके अलावा उन्होंने कोयले से पूरी मस्जिद के अंदर राम-राम लिख दिया है। मस्जिद के मोअज्जिन सैयद मोहम्मद खतीब ने यह केस दर्ज कराया था (केस संख्या 884)।
अंग्रेज पुलिस ने बल प्रयोग कर सिखों को श्रीराम जन्मभूमि परिसर से बाहर निकाला और वहां रेलिंग लगा दी गई। इसके बाद परिसर का विभाजन कर दिया गया। तब हिंदुओं को सिर्फ रेलिंग की दूसरी तरफ खड़े होकर और मस्जिद की तरफ मुंह कर श्री रामजन्म स्थान की पूजा करने की अनुमति थी।

हालांकि इससे भी पहले 1855 में बैरागी साधुओं ने लगभग 22.83 सेंटीमीटर के रामचबूतरा का निर्माण किया था। इस स्थान को अब हनुमानगढ़ी कहा जाता है। इसे लेकर बैरागियों का स्थानीय मुसलमानों के साथ भीषण संघर्ष भी हुआ था (के एम पणिक्कर: एन एनाटॉमी ऑफ ए कॉनफ्रंटेशन: अयोध्या एंड द राइज़ ऑफ कम्युनल पॉलिटिक्स इन इंडिया, (ए हिस्टोरिकल ओवरव्यू)। मुसलमानों का प्रतिरोध पहले अवध के नवाब के दरबार गया, लेकिन नवाब की सत्ता समाप्त होने के बाद अंग्रेजों के थानों और अदालतों में पहुंच गया।

1857 के स्वाधीनता संग्राम के तुरंत बाद रामचबूतरे के महंत ने इसका सुदृढ़ निर्माण कराया। माना जाता है कि 1861 में जिला प्रशासन ने मस्जिद को चबूतरे से अलग करने के लिए दीवार बनाई थी। लेकिन महंत रघुबर दास ने 1883 में चबूतरे के ऊपर मंदिर का निर्माण शुरू किया। लेकिन मुसलमानों की आपत्तियों के कारण अंग्रेज जिला मजिस्ट्रेट ने इसे रुकवा दिया। इस पर महंत रघुबर दास ने 1885 में उप न्यायाधीश, फैजाबाद की अदालत में मुकदमा दायर किया, जिसमें दावा किया गया कि चबूतरे के मालिक होने के नाते उन्हें वहां मंदिर बनाने की अनुमति दी जाए। 

फैजाबाद के उप न्यायाधीश ने महंत रघुबर दास को मंदिर बनाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया। उनका तर्क था- “यदि किसी स्थान पर चबूतरे पर मंदिर का निर्माण किया जाता है, तो मंदिर और शंख की घंटियां बजने लगेंगी। जबकि हिंदू और मुसलमान दोनों एक ही रास्ते से गुजरते हैं। यदि मंदिर निर्माण के लिए हिंदुओं को अनुमति दी जाती है, तो एक न एक दिन अन्य आपराधिक मामले शुरू हो जाएंगे और हजारों लोग मारे जाएंगे।”

महंत रघुबर दास ने इस फैसले के विरुद्ध लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। अंग्रेज जिला जज कर्नल एफ. ई. ए. कैमिर ने भी महंत की याचिका खारिज कर दी। लेकिन फैसले में यह जरूर लिखा कि- “यह सर्वाधिक दुर्भाग्यपूर्ण है कि हिंदू जिस भूमि को विशेष रूप से पवित्र मानते हैं, वहां पर मस्जिद का निर्माण किया गया है। लेकिन 356 साल पहले की घटना के लिहाज से शिकायत का समाधान करने में बहुत देर हो चुकी है।” 

लेकिन हिंदू दावे की लाचार स्वीकार्यता इसमें निहित थी। अब महंत रघुबर दास ने कैमिर के फैसले के विरुद्ध अवध के न्यायिक आयुक्त के न्यायालय में अपील की। एक नवंबर, 1886 को न्यायिक आयुक्त डब्ल्यू यंग ने कहा कि हिंदू “पवित्र स्थान” पर “ नया मंदिर”  बनाना चाहते हैं, जिसे “श्री रामचंद्र का जन्मस्थान” माना जाता है। “यह स्थान उस मस्जिद के आसपास के मैदान के भीतर स्थित है, जो बादशाह बाबर की कट्टरता और अत्याचार के कारण बनी थी, जिसने इस पवित्र स्थान को मस्जिद की जगह के तौर पर जानबूझकर चुना था, जो हिंदू कथा के अनुसार उनका पवित्र स्थान है।” 
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अंततः फैसला अदालत ने ही किया, लेकिन शायद तब, जब हिंदुओं ने अपनी बात रखने के लिए अपने मन से भय ग्रंथि को निकाल फेंका। और सुनिए- कथित ढांचे को पुनर्प्राप्त करने का प्रयास 1992 की तरह 1934 में भी हुआ था। लेकिन तब अंग्रेज सरकार ने उस ढांचे की वापस मरम्मत करवा दी थी। हालांकि उसे हिंदुओं से छीन लेने की कोशिश वह तब भी नहीं कर सके थे। 
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