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Ayodhya Ram Mandir: कभी मर्यादा से नहीं डिगते तुलसी के राम

Thu, 18 Jan 2024 10:19 PM IST
अमर शर्मा सर्जना शर्मा

सार

कलयुग में न कर्म है, न भक्ति है, न ज्ञान है। राम नाम ही एक आधार है। तुलसी ने राम के अनन्य भक्त हनुमान की भक्ति के माध्यम से राम को पाया और अपनी अमर-अजर कृति का सूत्रधार भगवान शिव को बनाया। वे पत्नी पार्वती को भगवान राम की कथा सुनाते हैं। तुलसीदास ने भगवान शिव के मुख से भगवान राम की कथा का जो वर्णन किया, उसमें रामचरित मानस के सात कांड को मानस सरोवर की सात सीढ़ियां बताया है।
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Ramlala - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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- सर्जना शर्मा
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दादी हमारे साथ रहती थीं और पापा जी ने सिखाया कि सुबह उठकर सबसे पहले दादी को राम-राम बोलो और आशीर्वाद लो। बचपन से लेकर नौकरी करने तक, जब तक दादी जीवित रहीं, सुबह घर से जाते हुए और बाहर से घर लौटकर उनको राम-राम करना नियम बन गया। पास-पड़ोस में यदा-कदा अखंड-रामायण के पाठ होते थे और हर साल रामलीला। रामलीलाओं में भगवान राम का जो चित्रण और वर्णन है,  वह गोस्वामी तुलसीदास के रामचरित मानस के आधार पर है। तुलसी के राम जन-जन के राम हैं, मन-मन के राम हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, माता-पिता और गुरु की आज्ञा मानने वाले हैं। जाति-पांति का भेदभाव नहीं करते। एक केवट के प्रति भी सम्मान का भाव रखते हैं। पति और समाज द्वारा त्याग दी गई अहिल्या से मिलते हैं और उन्हें नया जीवन देते हैं। वे स्त्रियों का सम्मान करते हैं। शरणागत की रक्षा करते हैं और अपने शत्रु के गुणों से सीख भी लेते हैं।

तुलसीदास ने भगवान राम को दिव्य और भव्य तो बनाया ही, साथ ही पुरुषों में उत्तम भी बनाया| बालकांड से लेकर उत्तरकांड तक भगवान राम को ऐसे व्यक्ति के रूप में चित्रित किया, जो किसी भी परिस्थिति में मर्यादा नहीं छोड़ता। उन्होंने यहां तक कहा कि भक्तों के हित और साधुओं के कल्याण के लिए भगवान विष्णु मनुष्य का रूप धारण कर धरती पर आए। यहां तक कि उन्होंने शबरी और जटायु को भी मुक्ति दी। तुलसीदास जी बालकांड में कहते हैं-
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ब्रम्ह नामते नामु बड़ बर दायक बर दानि।
रामचरित सत कोटि महं लिय महेस जियं जानि।।

अर्थात, राम का नाम निर्गुण और सगुण, दोनों से बड़ा है और वरदान देने वाले को भी वर देने वाला है। आदि देव महादेव ने अपने हृदय में यह जानकर ही सौ करोड़ रामचरित्र में से इस राम नाम को ही सार रूप में ग्रहण किया।

तुलसीदास कहते हैं कलयुग में न कर्म है, न भक्ति है, न ज्ञान है। राम नाम ही एक आधार है। तुलसीदास ने राम के अनन्य भक्त हनुमान की भक्ति के माध्यम से राम को पाया और अपनी अमर-अजर कृति का सूत्रधार भगवान शिव को बनाया। वे पत्नी पार्वती को भगवान राम की कथा सुनाते हैं। तुलसीदास ने भगवान शिव के मुख से भगवान राम की कथा का जो वर्णन किया, उसमें श्रीरामचरित मानस के सात कांड को मानस सरोवर की सात सीढ़ियां बताया है।

बालकांड में भगवान राम के बाल रूप का अति सुंदर वर्णन करते हुए तुलसीदास उनसे कृपा का अनुरोध भी करते हैं-

बंदउं बालरूप सोइ रामू।
सब सिधि सुलभ जपत जिसु नामू।।
मंगल भवन अमंगल हारी।
द्रवउं सु सदरथ अजिर बिहारी।।

तुलसीदास इस चौपाई में राम के बाल रूप की वंदना करते हैं और कहते हैं जिनका केवल नाम जपने से सब सिद्धियां सहज ही प्राप्त होती हैं, ऐसे मंगल के धाम अमंगल हरने वाले श्रीदशरथ जी के आंगन में खेलने वाले बालक राम मुझ पर कृपा करें।

किशोर होने पर ऋषि विश्वामित्र ने दशरथ से राम और भाई लक्ष्मण को धर्म की रक्षा के लिए वन में भेजने का अनुरोध किया। किशोर राम शस्त्र और शास्त्रों के ज्ञाता हैं। वेद का पाठ करते हैं, तो वन में शिकार भी करते हैं। राजसी वैभव में पले राम सहज ही वन्य जीवन अपना लेते हैं और कंदमूल फल खाने लगते हैं। राम श्यामल-गात हैं, लेकिन अति सुंदर वीर और बाहुबली हैं। जनकपुरी में जब वाटिका में सीताजी से उनका सामना होता है, तो दोनों एक-दूसरे को अपना हृदय सौंप देते हैं।

तुलसीदास ने उन्हें कहीं साधारण मनुष्य, तो कहीं पुरुषोत्तम के रूप में प्रस्तुत किया है। भगवान राम को सीता जितनी प्रिय लगीं, सीता को भी भगवान राम उतने ही प्रिय लगे और गौरी पूजन के लिए वाटिका में आईं सीता ने पार्वती से प्रार्थना की कि उन्हें वर के रूप में राम ही मिलें। इसका भी तुलसीदास बहुत सुंदर वर्णन करते हैं-

मोर मनोरथु जानहु नीकें।
बसहु सदा उर पुर सबही कें।।
कीन्हेउं प्रगट न कारन तेहीं।
अस कहि चरन गहे बैदेहीं।।

राम के दर्शन मात्र से ही सीता मन में उन्हें पति के रूप में धारण कर लेती हैं और कहती हैं कि मेरे मन में जो है, हे पार्वती मां, आप अच्छी तरह से जानती हैं, क्योंकि आप सबकी हृदय नगरी में निवास करती हैं। इसलिए मेरा मनोरथ पूरा करें। तब पार्वती भी सीता की विनती सुन प्रेम के वश में हो जाती हैं और कहती हैं कि हे सीता, मेरी सच्ची आशीष सुनो। तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी। उधर राम भी सीता के सौंदर्य का वर्णन गुरु विश्वामित्र से करते हैं। गुरु भी राम को उनका मनोरथ सफल होने का आर्शीवाद देते हैं। जनकपुरी में सीता स्वयंवर में राम अपने भाई लक्ष्मण के साथ आते हैं, तो सभी उनकी छवि पर न्यौछावर हो जाते हैं। मां पार्वती और गुरु विश्वामित्र का आशीर्वाद फलीभूत होता है और राम धनुष तोड़ देते हैं। महाक्रोधी ऋषि परशुराम सभा में आते हैं और जिसने धनुष तोड़ा, उसे दंड देने की बात करते हैं। सभा में उपस्थित सभी लोग भयभीत हो जाते हैं, लेकिन राम के हृदय में न हर्ष है, न विषाद। लक्ष्मण क्रोध पर नियंत्रण नहीं कर पाए और उन्होंने परशुराम से वाद-विवाद आरंभ कर दिया। परशुराम ने फरसा उठा लिया, तब राम ने बहुत विनम्र होकर परशुराम से विनती की-

नाथ करहुं बालक पर छोहू।
सूध दूधमुख करिअ न कोहू।।
जौं पै प्रभु प्रभाउ कछु जाना।
तौ कि बराबरि करत अयाना।।

राम परशुराम से कहते हैं कि हे नाथ, बालक पर कृपा कीजिए। इस सीधे, दुधमुहे बच्चे पर क्रोध न कीजिए। यदि यह आपकी प्रभुता और प्रभाव जानता, तो क्या यह नासमझ आपकी बराबरी करता। राम कहते हैं कि बच्चे यदि चपलता करते हैं तो गुरु, पिता और माता के मन में आनंद भर जाता है। आप लक्ष्मण को अपना बच्चा और सेवक जान कर कृपा कीजिए। स्थिति को संभालने के लिए राम परशुराम के गुणों का वर्णन भी करते हैं। राम के वचन सुनकर परशुराम का क्रोध कुछ शांत होता है।

राम माता-पिता के अनन्य भक्त हैं। उनके राज्याभिषेक की तैयारी चल रही है। पूरे अयोध्या में हर्ष की लहर है। मां कौशल्या फूली नहीं समा रही हैं। अचानक सब बदल जाता है। कैकेयी राजा दशरथ से अपने पुत्र भरत का राज्याभिषेक और कौशल्या के पुत्र राम के लिए वनवास मांग लेती हैं। पिता की आज्ञा शिरोधार्य कर राम राजसी पोशाक उतार कर संन्यासी बाना धारण कर लेते हैं। वे राजसी वैभव के साथ भी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ वन गमन कर सकते थे, लेकिन उन्होंने वनवासी की तरह ही 14 वर्ष रहने का निर्णय किया। 

वे जाति-पांति और छुआछूत में विश्वास नहीं रखते थे। निषादराज का आतिथ्य और केवट के बहुत अनुरोध पर अपने चरण धुलवा कर उन्होंने दोनों का सम्मान किया। गंगा पार उतारने पर जब राम केवट को शुल्क देना चाहते हैं, तो तुलसीदास के राम ऐसे व्यक्ति के रूप में आते हैं, जो किसी श्रमिक का शोषण नहीं करना चाहता।
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महलों का राजकुमार वनवासियों से अपार प्रेम पाता है। सबकी सहानुभूति भी उनके साथ ही है। उधर कैकेयी के पुत्र और उनके छोटा भाई भरत मां के निर्णय से बहुत व्यथित होते हैं। भरत बड़े भाई राम से मिलने वन जाते हैं। यहां भी राम बहुत उदारता का परिचय देते हैं। भरत को खरी-खोटी नहीं सुनाते। सप्रेम गले लगाते हैं। भरत लौटने का अनुरोध करते हैं, लेकिन राम कहते हैं कि माता-पिता की आज्ञा का पालन सत्यनिष्ठा से करना राजा बनने से कहीं महत्वपूर्ण है। 

तुलसी के राम पूरा वनवास साधारण व्यक्ति की तरह ही बिताते हैं और अंत में वनवासियों की सहायता से रावण का वध कर अयोध्या पर राज करते हैं।
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