मेरे लिए राम आदर्श साधक भी हैं और साध्य भी। व्यष्टि भी हैं, समष्टि भी। और इसमें भी भाता मुझे उनका संयम ही है। वह कभी भी अधीर नहीं होते। प्रतिक्रिया नहीं देते। ताकत नहीं दिखाते। चीजों को आखिर तक होने देते हैं। वह पल-पल को जीते हैं। जिंदगी के हर पल को जीना हमने राम से सीखा है। इसलिए भी कि संगीत की मेरी साधना बगैर संयम के पूरी नहीं होती।
फिर, क्या मेरा संगीत, आपकी आराधना, कर्मयोग भी संयम के बिना शायद ही सध सके। और इसमें गहरे तक उतरने की राह राम ही दिखाते हैं। राम की मर्यादा आकर्षक है। मर्यादा पुरुषोत्तम भी मुझे प्रिय हैं। वह मर्यादा बनाते भी हैं, निभाते भी।
राम बिखरते शाश्वत मूल्यों और टूटती सामाजिक मर्यादाओं को पुनर्स्थापित करने का भी नाम है। वह छल-छद्म, अहंकारी और पथभ्रष्ट सत्ता के विरुद्ध सत्य और न्याय की प्रखर आवाज हैं। राम पारिवारिक मूल्यों को अक्षुण्ण रखने की परम्परा का नाम है। राम की मर्यादा और उनके संयम को अगर साथ मिला लें तो कुछ शेष ही नहीं रहता।
व्यक्ति पूर्ण हो जाता है। मेरे साथ पूरे भारतीय जन मानस में राम को लेकर जो समझ है, उसका आधार तुलसी कृत रामचरित मानस है। इसका अपना सुर है, ताल है, लय है। इस पर रची गई संतूर की एक-एक लहरी दिल और दिमाग पर गहरे तक असर डालती है।